बिजली की लागत 2.30 रुपए रह गई, फिर भी 6 रु में दे रही है शिवराज सिंह सरकार | MP NEWS

Thursday, January 4, 2018

भोपाल। सीएम शिवराज सिंह चौहान की सरकार जनहितैषी होने का दावा करती है परंतु कुछ मामले ऐसे हैं जो सरकार का दूसरा ही चेहरा सामने ले आते हैं। पेट्रोल डीजल पर एक और टैक्स थोपने के बाद अब बिजली की दरों का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि मप्र में बिजली की लागत कम हो गई है। अब यह घटकर मात्र 2.30 रुपए रह गई है, बावजूद इसके सरकार ने बिजली के दाम नहीं घटाए, उल्टा बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। इतना ही नहीं सरकार संयत्रों में क्षमता होने के बावजूद बिजली का उत्पादन नहीं किया जा रहा, बल्कि प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीदी जा रही है।

पत्रकार श्री धनंजय प्रताप सिंह की रिपोर्ट के अनुसार इन दिनों बिजली कुल मांग का लगभग 25 फीसदी आपूर्ति ही सरकारी संयंत्रों से हो रही है। 11दिन से बिरसिंहपुर संयंत्र की 500 मेगावाट की इकाई बंद है। एक अन्य इकाई भी बंद हो गई।सिंगाजी की सुपर क्रिटीकल यूनिट में भी क्षमता से आधा उत्पादन हो रहा है। यही वजह है कि इंटर स्टेट सेक्टर सहित निजी कंपनियों से सरकार छह हजार मेगावाट बिजली खरीद कर सप्लाई कर रही है।

सरकारी संयत्रों का प्रदर्शन अच्छा है
प्रदेश में सबसे ज्यादा बिजली उत्पादन वाले बिरसिंहपुर संयंत्र में पहले एक यूनिट बिजली उत्पादन पर 800 ग्राम तक कोयला लगता था, जो अब घटकर 620 से 650 ग्राम औसतन लग रहा है। 210 मेगावाट वाले चचाई संयंत्र में 480 ग्राम कोयले में एक यूनिट बिजली बन रही है। सारणी संयंत्र में 900 से एक हजार ग्राम कोयले में एक यूनिट बिजली बनती थी, अब 750 ग्राम खपत हो रही है। सिंगाजी की सुपर क्रिटीकल यूनिट में 650 ग्राम कोयला एक यूनिट बिजली के लिए लगता है। बावजूद इसके सरकार अपने संयत्रों की पीठ नहीं थपथपा रही है। 

औसतन 25 फीसदी कोयले की खपत घटी 
कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकारी संयंत्रों में कोयले की खपत में 25 फीसदी की कमी आई है। यानी कोयले की खपत घटने बावजूद बिजली कंपनियां लगातार दाम बढ़ा रही हैं। अब नियामक आयोग में फिर दाम बढ़ाने के लिए याचिका लगाई है।

सरकारी पॉवर हाउस ठप, खपाई जा रही निजी सेक्टर की बिजली
प्रदेश में जितनी बिजली उत्पादन क्षमता है। उसका मात्र 42 फीसदी वार्षिक उत्पादन हो रहा है। सवाल ये है कि जब हमारे संयंत्रों में लागत घट रही है तो उन्हें पूरी क्षमता के साथ क्यों नहीं चलाया जा रहा है। सात हजार करोड़ की लागत से सिंगाजी संयंत्र खंडवा में लगाया गया। उसका औसत वार्षिक उत्पादन साढ़े 27 फीसदी है। पूरे प्रदेश में यही औसत साढ़े 44 फीसदी है। अधिकांश संयंत्रों को सरकार बंद रखती है। इसका जवाब किसी के पास नहीं है कि 4080 क्षमता के बाद भी 2243 मेगावाट उत्पादन ही क्यों हो रहा है।

कहां कितनी क्षमता और कितना उत्पादन 
सिंगाजी--1200--663
सारणी--1330--850
बीएसआर--1340--540
चचाई--210--210
कुल--4080--2243
हाईडल से उत्पादन : 268 मेगावाट
कुल मांग : 8932 मेगावाट

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