कोई तो रोको, इस अराजकता को

राकेश दुबे@प्रतिदिन। संसद से लेकर शिवपुरी [म.प्र] तक एक अजीब सा माहौल था| सरकार  कहीं की भी हो उसके खिलाफ आक्रोश था और राजनेताओं के खिलाफ माहौल| विषय एक ही था- प्रशासनिक विफलता और उसके परिणाम स्वरूप हिंसा|

संसद उत्तरप्रदेश के कुंडा और पंजाब के तरनतारन में हुई हिंसा के कारण उद्वेलित थी तो शिवपुरी में जनता सड़क पर थी| कुंडा और शिवपुरी दोनों ही जगह हिंसा हुई है और शिकार पुलिस| पुलिस का स्वरूप आज़ादी के बाद राजनीति के एक उपकरण के रूप में बदल गया है| वह अपने मूल काम के अतिरिक्त वह सब करती है, जो अंग्रेजों के समय से करती आ रही है| गुंडों से दबती है, राजनेताओं से संरक्षण पाती है और नागरिकों पर कभी डंडे, कभी गोली चलाती है| इसके विरोध में जो कुछ हो रहा है वह तो और गलत है| इससे अराजकता फैलेगी, जिसे रोकने की ताकत सिर्फ ईमानदारी में है| ईमानदारी से पुलिसिंग|

पुलिस के प्रशिक्षण के दौरान जो कुछ सिखाया जाता है उसका इस्तेमाल नहीं होता| बोध वाक्य को भूल राजनीति के बोल वचन को सब कुछ मानकर पुलिस के कुछ लोग सारे पुलिस विभाग के भाल  को कलंकित कर  देते हैं | आम जनता में यह बात गहरे तक पैठती जा रही है कि पुलिस सिर्फ राजनेताओं के रक्षण और जनता से वसूली के लिए है| जिस जनता के टैक्स से  तनख्वाह मिलती है उसके प्रति कोई जिम्मेदारी का भाव नहीं|

मध्यप्रदेश के युवा आई पी एस की मौत हो या कुंडा में डी एस पी की मौत| एक बात दोनों में साफ है की दोनों काम करना चाहते थे| पुलिस में अब ऐसे लोग बहुसंख्या में है जो काम नहीं करना चाहते| उन्हें डर लगता है कभी मानव अधिकार आयोग से, कभी गुंडों से, कभी पोस्टिंग करने वाले नेता से| रोको, कोई तो रोको नहीं, तो बहुत कुछ गलत हो जायेगा|

  • लेखक श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।


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