स्टूडेंट को सुधारने के लिए डराना अपराध नहीं: हाईकोर्ट

Tuesday, November 15, 2016

सुरेंद्र दुबे/जबलपुर। किसी भटके हुए या बिगड़े हुए विद्यार्थी को सुधारने की मंशा से डांटना-फटकारना या डराना एक शिक्षक अथवा प्राचार्य का पदीय दायित्व व मानवीय कर्त्तव्य है। लिहाजा, इसके लिए प्राचार्य के ऊपर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने का दोषारोपण कतई उचित नहीं माना जा सकता।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एसके पालो की एकलपीठ ने उक्ताशय की महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ शासकीय हायर सेकेंड्री स्कूल रीवा के प्रभारी प्राचार्य राजभान साकेत को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की धारा-306 के अपराध से मुक्त कर दिया। यह फैसला सेशन कोर्ट में चालान पेश होने के बाद आरोप-तय किए जाने की स्थिति को चुनौती देने के आधार पर सुनाया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि 9 वीं कक्षा के एक छात्र के खिलाफ उसी की कक्षा की छात्राओं ने छेड़छाड़ व अश्लील पत्र लिखने के आरोप लगाए। लिहाजा, प्राचार्य से गंभीरता बरतते हुए छात्र को बुलाकर डांट-फटकार लगाई। उसके पैरेंट्स को बुलाकर शिकायत करने की भी चेतावनी दी गई।

इसके बाद छात्र अपने घर गया स्कूल बैग रखा और खेत के पास आम के वृक्ष में फांसी लगा ली। जब उसके परिजनों को शव देखने को मिला तो वे बौखला गए और प्राचार्य के खिलाफ केस दर्ज करवा दिया। यह प्रक्रिया घटना के 4 माह बाद पूरी हुई। मामला अदालत पहुंचा और चालान पेश होने के बाद आरोप भी तय हो गए। जिससे घबराकर प्राचार्य ने हाईकोर्ट की शरण ली।

गुरु-शिष्य संबंधों पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी ने दलील दी कि यदि इस तरह शिक्षक या प्राचार्य को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की धारा लगाकर सजा दिलवाई गई तो परम्परागत गुरु-शिष्य संबंध पर अत्यंत प्रतिकूल असर होगा। ऐसा कोई प्रकरण सामने आने पर भविष्य में कोई भी शिक्षक अपने छात्र या छात्रा को उसकी गंभीर गलती पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले हजार बार सोचने लगेगा। हाईकोर्ट ने बहस को रिकॉर्ड पर लेकर प्राचार्य को आरोप से मुक्त कर दिया।( पढ़ते रहिए bhopal samachar हमें ट्विटर और फ़ेसबुक पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।)

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