अध्यापकों के अन्तर्निकाय संविलयन पर आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग ने लगाया रोड़ा | ADHYAPAK SAMACHAR

15 April 2018

सुरेन्द्र कुमार पटेल। इस पोस्ट को लिखते हुए मन बहुत क्षुब्ध है। इसलिए नहीं की अंतर्निकाय सम्विलियन का लाभ मिलने से वंचित हो रहा हूँ। बल्कि इसलिए कि शासन ने अध्यापक संवर्ग के साथ भावनात्मक खिलवाड़ किया है। मन इसलिए भी अधिकाधिक व्यथित है की अध्यापकों के दर्जन भर नेतृत्व में से किसी ने भी उस सख्ती से इस आदेश के विरोध में नहीं लिखा जितने की जरूरत थी। अभी तक यह बात सरकार के लिए लागू मानी जाती थी कि सरकार संख्याबल का अनुमान कर कोई निर्णय लेती है। वह अपना निर्णय वोट बैंक को ध्यान में रखकर लेती है। लेकिन इस आदेश के विरोध में अध्यापक संगठनों ने चुप्पी साधकर यह साबित कर दिया कि भीड़ को देखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।

अब आपको बताते हैं की हुआ क्या है
पिछले 3-4 सालों से अंतर्निकाय सम्विलियन (अध्यापकों का एक निकाय/जिले से दूसरे जिले में ट्रान्सफर को सरकार अंतर्निकाय samvilion कहती है) की कवायद चल रही थी। पिछले सितम्बर में अध्यापकों से आवेदन लिए गए। तमाम शर्तों और प्रतिबंधों के कारण स्थानान्तरण चाहने वाले बहुत से अध्यापक पहले ही अपात्र हो गए। तकरीबन 5 से 6 हजार अध्यापकों को पात्र मानकर प्रारम्भिक सूची निकाली गयी फिर उसमे भी दावे आपत्तियों के निराकरण के बहाने बहुत से अध्यापको बाहर कर दिया गया। पिछले 16 मार्च को लोक शिक्षण आयुक्त द्वारा आदेश जारी किये गए जिसमे कहा गया कि 15 अप्रैल तक समबन्धित जिले पदांकन आदेश जारी करेंगे और 16 अप्रैल से वर्तमान कार्यरत जिले से नवीन पदांकित विद्यालय के लिए कार्यमुक्त किये जायेंगे। किन्तु इसी बीच 13 अप्रैल के डेट से 13 तारिख को जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त के हस्ताक्षर से जनजातीय कार्य विभाग ने एक आदेश अपने पोर्टल पर डाल दिया कि जनजातीय कार्य विभाग के ऐसे अध्यापकों (सहायक अध्यापक, अध्यापक और वरिष्ठ अध्यापक) को जो शिक्षा विभाग में जा रहे हैं उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया जाये। शासन के इस निर्णय से हजारों अध्यापक क्षुब्ध, हताश और निराश हो गए हैं।

शासन से प्रश्न -
१-  अध्यपकों का अंतर्निकाय samvilion सरकार की samvilion नीति के अंतर्गत हो रहा है  जो पूरी तरह वैध है फिर कार्यमुक्ति पर प्रतिबन्ध क्यों?
२- यदि विभाग को अडंगा लगाना था तो इस बात को अध्यापकों के samvilion नीति में   स्पष्ट क्यों नहीं किया गया था ?
३- यदि विभाग को आपत्ति थी तो पहले स्पष्ट करना था ताकि अध्यापक जनजातीय विभाग के स्कूलों में चॉइस फीलिंग देते क्योंकि तब उनके पास विकल्प मौजूद था, शासन ने अध्यापकों को  अँधेरे में रखकर चोइस फीलिंग क्यों करवाया ? अध्यापकों ने तो वही चॉइस फीलिंग किया जो उपलब्ध करवाया गया ?
४- जब हम सुविधाओं और वेतन की मांग करते हैं तब विभाग हमें अपना कर्मचारी मानने से इनकार करता है तब हमें स्थानीय निकाय का कर्मचारी कहता है अब जब 20 वर्षो के वनवास से मुक्ति का समय आया तो विभाग अपना कर्मचारी मानकर हक जताने लगा और कार्यमुक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने लगा जो कतई उचित नहीं है
५ - बहुत सारे कार्य हैं जो एजुकेशन विभाग और जनजातीय विभाग के कर्मचारी दोनों ही करते हैं इन कार्यों को कराने के लिए विभाग प्रमुख एक हो जाते हैं और एक दुसरे के कार्य को कराने में रूचि भी लेते हैं फिर ऐसा क्यों है की जनजातीय कार्य विभाग, लोक शिक्षण विभाग के आदेश को उसे विश्वास में लिए बिना प्रतिबन्ध लगाने का कार्य करता है, इससे ऐसा लगता है की शासन ने saddyantra के तहत कुछ अध्यापकों को कार्यमुक्त होने से रोका है . 
६- अध्यापकों  के अन्तानिकाय samvilion पर मंत्रियों ने खूब वाहवाही लूटी है अर्थात अध्यपकों का samvilion राज्य शासन की मंशा के अनुसार हो रहा है तो क्या आयुक्त ने राज्य शासन को विश्वास में लिए बिना प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है और यदि ऐसा है तो क्या माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान जी यह सन्देश देना चाहते हैं की प्रदेश में उनका शासन नहीं बल्कि अधिकारियों  का शासन चलता है ?
७- जनजातीय कार्य विभाग ने विभाग में शिक्षकों की कमी को देखते हुए कार्यमुक्त करने से मना किया है, ऐसे में सवाल यह है कि आप  अपने अधिकार का प्रयोग कर जिस प्रकार अध्यापकों  को कार्यमुक्त होने से रोक रहे हैं उसी प्रकार आप अपने अधिकार का प्रयोग  कर अपने विभाग में शिक्षकों की भर्ती क्यों नही कर लेते ? क्यों बेचारे अध्यापकों  को विभाग की चक्की में पीस रहे हैं ?
८- अंतर्निकाय samvilion के पहले शासन की मंशा ही यह थी कि जो samvilion से जो पद रिक्त होंगे उन पदों पर सीधी भर्ती कर ली जायेगी इसलिए शासन ने अंतर्निकाय samvilion के लिए केवल उतने ही पद उपलब्ध कराये  हैं जितने पर सीधी भर्ती की जानी है. ऐसे में पुराणी  नीति को भुलाकर नई नीति लाना और पदांकन आदेश जारी  होने के बाद कार्यमुक्ति पर रोक लगाना उचित नहीं है. यह पदंकन आदेश प्राप्त कर चुके अध्य्पाकों पर वज्रपात के समान  है . 
९- जिन अध्यपकों के पदांकन आदेश हो चुके है वह नवीन जिले में जाने के हर संभव प्रयास करेंगे, अध्यापक नेताओं के हाथ-पैर जोड़ेंगे , मंत्रियों के चौखट पर माथा घिसेंगे और अंत में कोर्ट की भी शरण में जायेंगे . क्यों विभाग को जिसने वर्षों-वर्ष आपकी सेवा की है उसपर सहानुभूति नहीं है, क्यों इनको दर-दर भटकने के लिए मजबूर  किया जा रहा है , यदि आपके आदेश को निष्प्रभावी बनाने में यह सफल नहीं हो सके तो अपने घर  जाने का मूड बना चुके ये अध्यापक क्या कुंठित मानसिकता से सही सेवा कर पायेंगे.

सब जानते हैं कि शासन से लड़ना पत्थर पर सर पटकने के जैसा है, परन्तु ये अध्यापक लड़ेंगे . ऐसे में बेहतर होगा कि जनजतीय कार्यविभाग अपने उस आदेश को निरस्त करे और स्थानांतरित अध्यापकों  को उनके नवीन पदांकित शाळा में जाने में बाधक न बने ताकि २० वर्षों से बंधक के तरह काम कर रहा अध्यापक एक बार फिर पूरी फुर्ती से अपने सेवा दे सके.

तमाम अध्यापक संगठनों को भी चाहिए की इस आदेश से चाहे एक भी अध्यापक साथी प्रभावित हुआ हो उसके साथ खड़े हों और जनजातीय कार्य विभाग के प्रतिबंधात्मक आदेश को निरस्त करने में पूरी ताकत लगा दें ताकि अध्यापक साथियों का विश्वास संघ संगठन पर बना रहे।

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