अनुकंपा नियुक्ति का दावा समय के साथ समाप्त हो जाता है: हाई कोर्ट

Updesh Awasthee
जबलपुर, 19 अप्रैल 2026
: सरकारी कर्मचारी का सेवा के दौरान निधन हो जाने के पश्चात उसके आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति के संबंध में हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश का यह फैसला, अनुकंपा नियुक्ति के उन उम्मीदवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो विभागीय अधिकारियों के मौखिक आश्वासन के आधार पर वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय के साथ अनुकंपा नियुक्ति का दावा समाप्त हो जाता है। इसलिए उम्मीदवार को समय रहते हाई कोर्ट में आना चाहिए। 

हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश के जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसकी अनुकंपा नियुक्ति की मांग अस्वीकार की गई। याचिकाकर्ता के पिता दूरसंचार विभाग की एक इकाई में कार्यरत थे और अप्रैल 2005 में सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। इसके तुरंत बाद मई, 2005 में याचिकाकर्ता ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया लेकिन वर्षों तक उसे कोई जवाब नहीं मिला। बाद में उसने 2016 और फिर 2020 में पुनः आवेदन किया।

वर्ष 2020 में उसे बताया गया कि उसकी एप्लीकेशन पहले ही खारिज कर दी गई थी, क्योंकि उसे निर्धारित 100 अंकों में से केवल 39 अंक मिले थे जबकि न्यूनतम 55 अंक आवश्यक थे। हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट से परिवार को उबारना होता है।

अनुकंपा नियुक्ति का क्लेम एक्सपायर हो जाता है
“ न्यायालय ने विशिष्ट टिप्पणी में कहा कि, अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य समय के साथ समाप्त हो जाता है। 20 वर्ष बाद किया गया दावा किसी आपात स्थिति से जुड़ा नहीं माना जा सकता।”

अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता का मामला 2008 में एक सक्षम उच्चस्तरीय समिति द्वारा परखा गया और उसकी आर्थिक स्थिति सहित सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया गया। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसका मामला लंबित रखा गया या अनदेखा किया गया।

साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है, जो यह दर्शाता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से दयनीय नहीं है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसे अस्वीकृति का पत्र नहीं मिला तो इसे साबित करने का दायित्व उसी पर होता है। इस मामले में याचिकाकर्ता ऐसा साबित नहीं कर सका।

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि मामला समय-सीमा से भी बाधित है और इतने लंबे अंतराल के बाद राहत नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर याचिका खारिज की गई।
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