मप्र में दीपक बावरिया भी सीपी जोशी जैसा खेल खेल रहे हैं | MP NEWS

Sunday, March 4, 2018

भोपाल। पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस की क्या हालत हुई सब जानते हैं। त्रिपुरा और नगालैंड में तो सूपड़ा ही साफ हो गया। गुजरात चुनाव के बाद लगने लगा था कि कांग्रेस में सुधार हो रहा है परंतु एक बार फिर गड्ढे में जाती नजर आने लगी है। चुनाव परिणामों के बाद तीनों राज्यों के कांग्रेसी नेताओं ने इसके लिए कांग्रेस के महासचिव एवं प्रभारी सीपी जोशी को जिम्मेदार बताया है। स्थानीय नेताओं ने सीपी जोशी के बारे में जो बातें कहीं हैं, मध्यप्रदेश के प्रभारी दीपक बावरिया से काफी मिलती जुलती नजर आ रहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सीपी जोशी के कारण पूर्वोत्तर में सूपड़ा साफ हुआ था, दीपक बावरिया के कारण कांग्रेस मध्यप्रदेश में भी मुंह दिखाने के काबिल ना बचे। 

पूर्वोत्तर के कांग्रेसी क्या आरोप लगा रहे हैं सीपी जोशी पर
पूर्वोत्तर के अधिकांश बड़े नेताओं ने सीपी जोशी को हार के लिए जिम्मेदार माना है। 
नगालैंड कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने सीपी जोशी को नेगेटिव माइंड सेट का नेता बताया। 
इनको जन भावनाओं और संवेदना की समझ तक नहीं है। 
कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले स्टेट में स्टार प्रचारकों को प्रचार करने तक से रोक दिया। 
ढाई साल से जोशी ने राहुल गांधी को आने नहीं दिया। 
पूर्वोत्तर में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने की साजिश रची थी। 
पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए फंड तक नहीं दिया गया। 
पार्टी को मजबूत करना चाहते ही नहीं थे। 
पार्टी की जीत हार से उनको कोई सरोकार नहीं था। 
उनके कारण कांग्रेस पार्टी बिखर गई।
उनके कारण पार्टी के कई नेताओं ने दल बदला। 

मध्यप्रदेश में दीपक बावरिया क्या कर रहे हैं
संगठन को मजबूत करने में रुचि नहीं, केवल बयानबाजियां करते हैं। 
जनभावनाओं की समझ ही नहीं है, समझने की कोशिश भी नहीं कर रहे। 
कुछ नेताओं के साथ मिलकर माइंडसेट बना लिया है, मप्र का कोई अध्ययन नहीं है। 
राहुल गांधी को मप्र आने नहीं दे रहे, मप्र के नेताओं को राहुल गांधी तक पहुंचने नहीं देते। 
मप्र में हुए उपचुनावों में दीपक बावरिया का कोई योगदान नहीं रहा। चित्रकूट अजय सिंह के कारण जीते, मुंगावली और भिंड ज्योतिरादित्य सिधिया के कारण। 
किसी भी उपचुनाव में पार्टी लड़ती हुई नजर नहीं आई। 
नगरपालिका चुनाव में प्रत्याशी अपनी दम पर जीतकर आए। बावरिया के पास कोई होमवर्क नहीं था। 
जीतने वाले उम्मीदवारों को प्रोत्साहित नहीं किया। 
हाईकमान की तरह फैसले सुनाते हैं, संघर्ष की कोई रणनीति नहीं है। 

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