मप्र में दुर्लभ बाघों के अस्तित्व पर संकट: सरकार लापरवाह

Updesh Awasthee
मित्रो नमस्कार, 
आज ग्लोबल टाइगर है जो हमें बाघों के संरक्षण पर गंभीरता से काम करने हेतु प्रेरित करता है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश में बाघों की सुरक्षा के प्रति शिवराज सरकार की लापरवाही निम्नलिखित बिन्दुओ में उजागर होती है। आज शिवराज सरकार जनता को जबाब दे की ऐसी लापरवाही क्यों हो रही है ?

1 )30 से अधिक बाघों वाले रातापानी अभ्यारण को मप्र सरकार ने 2008 में टाइगर रिज़र्व बनाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की लेकिन केंद्र सरकार की प्रारंभिक अनुमति मिलने के बाद भी जब मप्र सरकार ने लम्बे समय तक इसे टाइगर रिज़र्व घोषित नहीं किय तो हमें हाई कोर्ट जाना पड़ा जहा मप्र सरकार ने यू टर्न लेते हुए टाइगर रिज़र्व बनाने से मना  कर दिया। इससे बाघों को खतरा हो गया है।

2 )बाघों के संरक्षण,निगरानी ,सुरक्षा और समन्वय के लिए वन्य प्राणी अधिनियम 1972 के तहत मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय स्टीयरिंग कमेटी की बैठक 2009 से आज तक नहीं हुयी। इस कमिटी में मुख्य सचिव ,वन मंत्री और वन विभाग सहित अन्य विभाग के बड़े अधिकारी  सदस्य होते है। 2012 से 2014 तक ये समिति निष्क्रिय रही और 2014 अगस्त में बनी तो तथाकथित तीन वन्य विशेषज्ञों को रखा गया जिन्हे आज तक मप्र की किसी भी समस्या को उठाते हुए नहीं देखा गया।

3 ) इंदिरा सागर प्रोजेक्ट में नष्ट हुए वनो की क्षतिपूर्ति के लिए 30 साल पहले खंडवा और देवास के जंगलो में ओंकारेश्वर नेशनल पार्क ,सहित 2 सैंक्चुअरी बनाना था लेकिन आज तक नहीं बनाई गयी जिससे बड़ी संख्या में तेंदुओं की मौत हुयी है। बाघों का सफाया हो गया।

4 )शिकारियों से बाघों को बचाने के लिए स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फ़ोर्स बनाने हेतु केंद्र सरकार 2008 से 100 प्रतिशत आर्थिक सहायता देने को कह रहा है लेकिन वन और खनिज माफिया के दबाब में मप्र सरकार ने आज तक फ़ोर्स नहीं बनायीं। इस मामले को लेकर हमारी याचिका पर हाई कोर्ट ने निर्देश भी दिए लेकिन शिवराज सरकार ने उन्हें भी नहीं माना।

5 )वन्य प्राणियों की चिकित्सा विशेष तौर पर बाघों के संरक्षण के लिए मप्र सरकार ने 2005 में वन्य प्राणी चिकित्सको का कैडर बनाने का निर्णय लिया लेकिन आज तक नहीं बनाया।

6 )राज्य वन्य प्राणी बोर्ड में अयोग्य लोगो को राजनैतिक दबाब में सदस्य बनाया गया जिससे बाघों के संरक्षण की समस्या पर उचित कार्यवाही नहीं हो पाती।

7 )बाघों के शिकारियों को कोर्ट में सजा दिलवाने में असफल रहने से वन विभाग शिकारियों में कानून का खौफ नहीं बना पाया।

8 )बांधवगढ़ में बाघों के लगातार शिकार होने के बावजूद वहां के संचालक मुरलीकृष्णन को सरकार ने मई में हटाने बावजूद आज तक रिलीव नहीं किया। केंद्र के निर्देश है की बाघों के अप्राकृतिक मौत पर जबाबदेही तय होगी लेकिन मुरलीकृष्णन के साथ ऐसा नहीं हुआ।

मित्रो हमारी मांग है की उपरोक्त बिन्दुओंपर तत्काल कार्यवाही हो।

सधन्यवाद
अजय दुबे
सचिव
प्रयत्न 

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