कर्मचारी समाचार डेस्क, 26 अप्रैल 2026: भारत के विभिन्न राज्यों में नियमित हो चुके ऐसे सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह गुड न्यूज़ है जिनकी नियुक्ति संविदा कर्मचारी यानी कॉन्ट्रैक्ट वर्कर के तौर पर हुई थी। अनुबंध के आधार पर नियुक्त किए गए कर्मचारियों को सरकारों ने नियमित तो कर दिया परंतु उनके अनुबंध अवधि को सेवा में शामिल नहीं किया।
Landmark Ruling: High Court Invalidates Act on Contract Employees’ Service Conditions
शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा शामिल थे, ने कुल 445 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए "हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्त अधिनियम, 2024" को असंवैधानिक करार दिया। अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया है कि अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 संविधान के प्रावधानों के विपरीत हैं। कोर्ट ने कहा कि जब इन प्रमुख धाराओं को हटाया जाता है तो अधिनियम में कोई सार्थक प्रावधान शेष नहीं रहता, इसलिए पूरे कानून को निरस्त करना आवश्यक हो जाता है।
अब तक के सभी आदेश अमान्य, कारवाइयां असंवैधानिक
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि इस अधिनियम के आधार पर राज्य सरकार या उसके अधिकारियों द्वारा की गई सभी कार्रवाइयां असंवैधानिक और अमान्य मानी जाएंगी। इसके तहत जारी सभी आदेश, निर्देश और कर्मचारियों से लाभों की वापसी या वसूली से जुड़े प्रस्ताव भी रद्द कर दिए गए हैं।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सक्षम अदालतों के आदेशों के अनुरूप कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी वित्तीय लाभ सुनिश्चित करें। यह मामला उन हजारों कर्मचारियों से जुड़ा है जिन्हें शुरू में संविदा अथवा अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2003 के बाद इन कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित किया गया, लेकिन उनकी अनुबंध अवधि को नियमित सेवा में शामिल नहीं किया गया और उन्हें वित्तीय लाभ से वंचित रखा गया।
कर्मचारियों ने सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट तक मामला जीत लिया। इसके बावजूद राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में "हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्त अधिनियम, 2024" लागू कर पहले दिए गए वित्तीय लाभों को वापस लेने की कोशिश की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार ने इस अधिनियम के जरिए न्यायपालिका के फैसलों को पलटने का प्रयास किया, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उनका तर्क था कि किसी भी न्यायिक निर्णय को केवल न्यायपालिका ही बदल सकती है, न कि विधायिका।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 17 जुलाई 2025 को इस अधिनियम के तहत लाभ वापसी के आदेश जारी किए गए, जो पूरी तरह असंवैधानिक थे। हाईकोर्ट के इस फैसले से अब प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को न केवल राहत मिली है, बल्कि उनके बकाया वित्तीय लाभ मिलने की प्रक्रिया भी तेज होगी। सिर्फ इतना ही नहीं भारत के अन्य राज्यों में, इस प्रकार के अनुबंध पर आधारित सरकारी कर्मचारियों को भी इस मामले का लाभ मिलेगा।

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