उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार: मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्र से IPS बन गया, पूरी नौकरी की और रिटायर भी हो गया

Updesh Awasthee
भोपाल, 19 सितंबर 2026:
टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ और अखबारों में हैडलाइंस है कि, मध्य प्रदेश में एक रिटायर IPS अधिकारी के खिलाफ फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है, जबकि खबर यह है कि मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर न केवल भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी बन गया बल्कि उसने शान के साथ अपनी नौकरी पूरी की, और आराम से रिटायर हो गया। अभी तो केवल मामला दर्ज हुआ है, निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा, और सब जानते हैं कि रिटायर हो चुके अधिकारी के जीवन के अंतिम दिन तक, सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ पाएगा। यह एक व्यक्ति द्वारा की गई गड़बड़ी नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश शासन में हुआ उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार है। चलिए थोड़ा डिटेल में बात करते हैं:- 

यह है कहानी, विदाउट डेट लाइन

मामले की शुरुआत गुना के राघौगढ़ निवासी हरवीर सिंह रघुवंशी की शिकायत से हुई। शासन की उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने रघुवीर सिंह मीणा के जाति प्रमाण-पत्र और संबंधित रिकॉर्ड की जांच की। जाति की जांच मे पता चला कि पुलिस सेवा में आने से पहले रघुवीर सिंह मीणा मध्यप्रदेश में शासकीय शिक्षक के पद पर थे। उस समय उनके दस्तावेजों में उन्हें OBC वर्ग का बताया गया था। बाद में MPPSC में उन्होंने खुद को ST वर्ग का बताया। इसी आधार पर DSP पद पर उनका चयन हुआ। जांच एजेंसी अब इसी बदलाव से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड की पड़ताल कर रही है। मीणा का ST जाति प्रमाण-पत्र वर्ष 1984 में विदिशा के आदिम जाति कल्याण विभाग से जारी हुआ था। उच्च स्तरीय जांच में प्रमाण-पत्र और इससे जुड़े रिकॉर्ड की जांच की गई। समिति ने इसे अमान्य घोषित कर दिया।जांच में मध्यप्रदेश के मूल निवासी होने से जुड़े दस्तावेजों पर भी सवाल उठे हैं। प्रमाण-पत्र जारी करने वाले कर्मचारी भी जांच के दायरे में हैं। समिति की जांच में प्रमाण-पत्र अमान्य पाए जाने के बाद अब पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने केस दर्ज किया है। पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने धोखाधड़ी, साजिश, लोक सेवक द्वारा गलत दस्तावेज तैयार करने और SC-ST अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं में FIR दर्ज की है। 

अब कुछ ध्यान देने वाले बिंदु

सबसे बड़ा सवाल कि जब मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन निष्पक्ष परीक्षा के आयोजन के लिए किया गया है तो फिर परीक्षार्थी के डॉक्यूमेंट की जांच वह क्यों नहीं करता। यहां पक्षपात करने के लिए डिपार्टमेंट को अवसर क्यों दिया जाता है। 
एमपीपीएससी की परीक्षा के बाद जब डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन किया जा रहा था, तब यह फर्जी जाति प्रमाण पत्र क्यों नहीं पकड़ा गया। उस अधिकारी के खिलाफ भी मामला दर्ज होना चाहिए जिसने डॉक्यूमेंट वेरीफाई किया। 
जब राज्य पुलिस सेवा से भारतीय पुलिस सेवा में प्रमोट किया गया, तब जाति प्रमाण पत्र की जांच क्यों नहीं की गई। जबकि इस प्रक्रिया में तो कई प्रकार की जांच की जाती है। पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग में वह कौन था जिसने मामले को दबाए रखा। 
सब जानते हैं श्री रघुवीर सिंह मीणा, राजस्थान के रहने वाले हैं। ड्यूटी के दौरान कई बार वह सरकारी गाड़ी लेकर, वर्दी पहने हुए राजस्थान गए थे। शायद किसी चुनाव में कोई विवाद भी हुआ था। राजस्थान के अखबारों में खबर छपी थी, मध्य प्रदेश और गुना के अखबारों में भी खबर छपी थी। वह कौन है जिसे नजरअंदाज किया और मूल निवासी प्रमाण पत्र की जांच नहीं की। 
श्री रघुवीर सिंह मीणा के फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मामला उनकी सेवा में रहते ही मीडिया हेडलाइंस में आ गया था, फिर वह कौन था जिसने जाति प्रमाण पत्र की जांच को इतना धीमा कर दिया, कि श्री मीणा के रिटायर हो जाने के इतने लंबे समय बाद जांच रिपोर्ट आई। 
जब फर्जी जाति प्रमाण पत्र का आरोप सामने आ गया था तो फिर वह कौन था जिसने IPS मीना को पावरफुल पोस्टिंग दी, उनको लूप लाइन में नहीं डाला। 
वह कौन था जिसने श्री रघुवीर सिंह मीणा की पत्नी श्रीमती ममता मीना को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया, जबकि वह जानता था कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मामला है। 

रघुवीर सिंह मीणा के खिलाफ FIR, न्याय है या साजिश

यदि कोई पुराने दोहे चौपाई पढ़ना हो तो बिल्कुल कह सकते हैं कि, व्यवस्था में न्याय जरूर होता है फिर चाहे थोड़ी देरी क्यों ना हो जाए लेकिन असल बात यह है कि, श्री रघुवीर सिंह मीणा के खिलाफ FIR कोई न्याय नहीं बल्कि एक साजिश है। श्री रघुवीर सिंह रिटायर हो चुके हैं, उनकी उम्र 65 वर्ष के आसपास है। अब कैलकुलेशन शुरू करते हैं:- 
  • जाति प्रमाण पत्र की जांच में इतना समय लग गया तो फिर FIR दर्द होने के बाद पुलिस को जांच करने में भी काफी समय लगेगा। चलो एक साल मान लेते हैं। (उम्र 66 साल)। 
  • फिर भोपाल न्यायालय में मामला चलेगा और सरकारी वकील एवं रघुवीर सिंह के वकील के बीच में आर्गुमेंट होंगे लेकिन इसके पहले तारीख पर तारीख...., भोपाल कोर्ट में मामले इतनी ज्यादा पेंडिंग है कि श्री रघुवीर सिंह के मामले में फैसला आते-आते 5-6 साल तो लग ही जाएंगे। (उम्र 71 साल)। 
  • यदि मान लेते हैं कि श्री रघुवीर सिंह को सजा हो जाएगी, तो वह अपील करेंगे। यहां भी मामला 10 साल तक तो लंबित रह ही सकता है। कुछ मामले तो 25-30 साल में पेंडिंग रहे हैं। अपन 10 साल मान लेते हैं। (उम्र 81 साल)। 
  • अब मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की हालत तो आपको पता ही है, पूरा समय संविधान की रक्षा में निकल जाता है। कभी सरकार कोई गलत कानून बना देती है तो कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन हो जाता है, और फिर चुनाव भी तो हैं। सबको मालूम रहता है कि फैसला चुनाव आयोग करेगा, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फाइल करते हैं, सुप्रीम कोर्ट का टाइम जरूर बर्बाद करते हैं। तो फिर एक बूढ़े आदमी के जाति प्रमाण पत्र के मामले को सुप्रीम कोर्ट क्यों महत्व देगा। और फिर जो व्यक्ति अपने खिलाफ होने वाली जांच को इतने लंबे समय तक पेंडिंग करवा सकता है, उसको कानून की उन सारी अलमारी का जरूर पता होगा जहां पर फाइल को रख देने से, वह लंबे समय तक पेंडिंग में चली जाती है। तो 20 साल समझ लेते हैं। 
इस प्रकार जब फैसला आएगा तो श्री रघुवीर सिंह जी की उम्र 101 साल होगी? क्या आपको लगता है कि श्री रघुवीर सिंह जी इतने फिट है कि वह 101 साल तक आशीर्वाद देने के लिए हम सब के बीच में रहेंगे और यदि रहेंगे भी तो 100 साल के वृद्ध को सुप्रीम कोर्ट क्या सजा देगा? 

यदि भी इसमें से कोई प्रक्रिया थोड़ी जल्दी हो गई और सुप्रीम कोर्ट का फैसला अपने कैलकुलेशन से 20 साल पहले आ गया और सजा सुना भी दी गई, तब भी, 80 वर्ष आयु के श्री रघुवीर सिंह को जेल में बंद कौन रख पाएगा। इस उम्र में तो कह दिया अस्पताल में रहते हैं। समझ रहे हो ना विनोद!🔚

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