भोपाल, 2 अगस्त 2026: भोपाल के रिहायशी इलाकों में गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। रविवार को जब शहर छुट्टी मना रहा था, तब अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर और बावड़ियाकलां जैसे पॉश इलाकों के लोग सड़कों पर उतर आए। मसला ये है कि घरों के बीच में (रेजिडेंशियल इलाकों में) जो ये अवैध दुकानें, होटल और 'चाय-सुट्टा बार' खुल गए हैं, उन्होंने रहवासियों का जीना मुहाल कर दिया है।
ये सीलिंग है या मजाक?
नगर निगम ने शनिवार को बड़े ठाठ से 19 दुकानों को सील करने का 'दम' दिखाया था, लेकिन रहवासियों ने उनकी इस कार्रवाई की धज्जियां उड़ा दीं। लोगों का कहना है कि ये सब बस दिखावा है। अपर्णा वाशिष्ठ और कमल राठी ने बताया कि निगम वालों ने दुकानों को ढंग से बंद करने के बजाय बस एक जैसे 'पोस्टर' चिपका दिए कि 'व्यावसायिक गतिविधियां बंद हैं', और देखते ही देखते दुकानें फिर से चालू हो गईं। 10 नंबर मार्केट जैसे इलाकों में तो सीलिंग के बावजूद दुकानें खुली रहीं, जिसका सबूत अब सीधे कोर्ट में पेश किया जाएगा।
मोहल्लों में 'सुट्टा' और संदिग्धों का डेरा
गौतम नगर के रहवासियों ने तो पैदल मार्च निकालकर अपना दुखड़ा सुनाया। समिति के अध्यक्ष मोहन खरपते और सोमकांत उमलकर ने बताया कि उनके इलाके में अवैध हॉस्टल और चाय-सुट्टा बार की ऐसी बाढ़ आई है कि देर रात तक संदिग्ध लोगों का जमघट लगा रहता है। हद तो तब हो गई जब क्षेत्रीय निवासी आदित्य ने बताया कि उनके घर के सामने दिन भर लोग इतनी सिगरेट फूँकते हैं कि उनके परिवार वालों के फेफड़े तक संक्रमित हो गए हैं।
नेताओं को सीधी चेतावनी: "वोट चाहिए तो काम करो"
इस आंदोलन में भोपाल के पूर्व कमिश्नर कवींद्र कियावत भी शामिल हुए और उन्होंने साफ कहा कि इस अराजकता के खिलाफ सबको एकजुट होना पड़ेगा। शाहपुरा की शुभ्रा गोयल ने भी आरोप लगाया कि नगर निगम ने उनके इलाके के अवैध निर्माणों पर जानबूझकर अपनी आंखें मूंद रखी हैं। रहवासियों ने साफ शब्दों में नेताओं को भी लपेटे में ले लिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि भोपाल के 95% मतदाता इस समस्या से परेशान हैं। जो नेता इन अवैध संचालकों को अंदरखाने सपोर्ट कर रहे हैं, अगले चुनाव में रहवासी उनका कड़ा विरोध करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली 'पेशी'
शिकायतकर्ता विवेक त्रिपाठी और लवनीश भाती ने मन बना लिया है कि नगर निगम की इस 'लाचार' और 'औपचारिक' कार्रवाई का पूरा कच्चा चिट्ठा 4 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में रखेंगे। लोगों का कहना है कि प्रशासन और अवैध संचालकों की इस 'साठगांठ' ने आम जनता का भरोसा तोड़ दिया है।
अब देखना ये है कि भोपाल की ये 'जनता की अदालत' नगर निगम को सीधे रास्ते पर ला पाती है या नहीं!

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