कभी चपरासी क्वार्टर में रहते थे 900 करोड़ के चारा घोटाले में जेल गए लालू प्रसाद | national news

Saturday, December 23, 2017

अपने 68 वर्षों के जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव झेल चुके राजद प्रमुख वर्तमान में देश की राजनीति में अहम स्थान रखते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने कभी अपना अतीत नहीं भुलाया है। प्रमाण यह कि पहली बार विधायक बनने से लेकर मुख्यमंत्री बनने के चार महीने के बाद पटना के वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर के एक छोटे से घर में रहे और आज भी 10, सर्कुलर रोड स्थित पूर्व मुख्यमंत्री आवास के एक कोने में एस्बेस्टस के कमरे में बैठकर देश की राजनीति करते हैं।

चपरासी क्वार्टर में रहने वाली उनकी एकमात्र बहन गंगोत्री देवी की मानें तो लालू प्रसाद भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वे बताती हैं कि केवल लालू ही उनसे छोटे हैं। अन्य सभी भाई उम्र में उनसे बड़े। लालू के नामकरण के संबंध में उनकी बहन ने बताया कि बचपन में लालू बहुत गोल-मटोल थे और खूब गोरे थे। उनके रंग को देखकर ही उनके पिता कुंदन राय ने उनका नाम लालू रखा था। 

लालू और अपने बचपन के बारे में गंगोत्री देवी ने बताया कि अन्य भाइयों की तुलना में लालू के साथ उनका लगाव अधिक था। हालांकि सभी भाई उन्हें भाई सरीखा मानते थे। कहते थे कि हम छह नहीं सात भाई हैं। एक घटना का जिक्र करते हुए लालू प्रसाद यादव की बहन ने बताया कि उस दिन बाबू जी मवेशी चराने जा रहे थे। रास्ते में गांव के ही एक व्यक्ति से उनका झगड़ा हो गया। तब लालू 14-15 वर्ष के किशोर थे। झगड़े की जानकारी मिलने पर दौड़ पड़े। इस बीच वे स्वयं भी पहुंच गईं और फिर सबने मिलकर झगड़ा करने वाले उस व्यक्ति की धुनाई कर दी। तब से सभी भाई उन्हें भाई सरीखा ही मानते रहे।

अपने भाई लालू प्रसाद की शिक्षा-दीक्षा व लालन-पालन के संबंध में पूछने पर उनकी बहन ने बताया कि बाबू जी के पास एक धुर भी जमीन नहीं थी। घर में कुछ मवेशी थे और बाबू जी तब खेतिहर मजदूर थे। इसी से घर चलता था। उन दिनों खाने के भी लाले थे। कभी मकई का दर्रा तो कभी साग-रोटी खाकर दिन गुजारना पड़ता था। भाई महावीर राय और मुकंद राय को पटना में नौकरी मिली तब जाकर स्थिति बदली। उन्होंने बताया कि उन दिनों गरीबी इतनी थी कि उनके पिता ने केवल तीस रुपए दहेज में देकर उनकी शादी गोपालगंज जिले के ही सिकटिया पंचायत के चक्रपाणि गांव में की थी।

लालू पढ़ने में शुरू से तेज थे। भाइयों को पटना में क्वार्टर मिला तो वे यही आ गये और पढ़ने लगे। यही क्वार्टर के पास गाय-भैंसें रहती, जिसके देख-रेख की जिम्मेवारी लालू की थी। जिन दिनों लालू प्रसाद संपूर्ण क्रांति आंदोलन में संघर्ष कर रहे थे, उन दिनों भी घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन किसी तरह से एक ही कपड़ा बार-बार धोकर पहनने को मजबूर प्रसाद ने हार नहीं मानी। फिर वह समय भी आया जब वे पहली बार विधायक चुने गये। विधायक बनने के बाद चपरासी क्वार्टर के पास ही एक बैठका बनवाया था। इसी बैठका में वे लोगों से मिलते थे।

प्रसाद की बहन बताती हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी लालू नहीं बदले। पहले चार महीने तो वे यहीं से रहकर बिहार की सरकार का कामकाज देखते थे। सुबह में इसी बैठका में अधिकारी, नेता और जनता सब जुटते थे। बहन की माने तो लालू आज भी नहीं बदले हैं। आज भी वे पटना में रहने पर वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर में आते हैं। यहां मुहल्ले में रहने वाले सभी से मिलते हैं। इसके अलावा यहां के लोगों के हर सुख-दुख में शामिल रहते हैं। यहीं संस्कार उनके बच्चों का भी है।

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