“पप्पू” शब्द पर रोक और राजनीतिक बोल वचन | Review of Principles of Indian Politics

Wednesday, November 15, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। राजनीति के खेल बड़े अजीब है। चुनाव आयोग ने गुजरात चुनाव के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को “पप्पू” कहने पर रोक लगा दी है। इस आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी अपने इलेक्ट्रनिक प्रचार में “पप्पू” शब्द का इस्तेमाल नहीं करेगी। आदेश में यह भी कहा गया है कि यह शब्द कांग्रेस उपाध्यक्ष के लिए इस्तेमाल किया जाता है और आपत्तिजनक जनक है। दूसरी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को समझाया कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी से हमारे मतभेद हैं, इसलिए हम उनका विरोध करेंगे लेकिन प्रधानमंत्री पद का अनादर नहीं करेंगे। इससे पहले भी कांग्रेस की एक सभा में 'नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद' का नारा लगने पर वह लोगों को टोक चुके हैं। उनका कहना था कि मोदी हमारे राजनीतिक विरोधी हैं, इसलिए हम उनसे लड़ेंगे और उन्हें हराएंगे लेकिन मुर्दाबाद जैसे शब्द हम किसी के लिए नहीं कहेंगे।

लंबे अर्से बाद देश की राजनीति में किसी ने ऐसी बातें देखने में आ रही है है या यूं कहें कि ऐसी बात कहने या आदेश निकालने की जरूरत हुई है। वरना देश में विरोधियों का सम्मान करने की राजनीतिक संस्कृति हमेशा रही है। कांग्रेस की ही नेता इंदिरा गांधी के शासनकाल में विरोधी राजनीतिक नेताओं को जेल तक भेज दिया गया था। इसके बावजूद चुनाव लड़ने और जीतने के बाद भी कभी किसी बड़े नेता ने इंदिरा गांधी के लिए अशोभनीय बातें नहीं कहीं मगर पिछले कुछ समय से देश में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर आक्रामक बयानों वाली राजनीति का चलन बढ़ता जा रहा है। इसके प्रभाव में विरोधियों के प्रति तीखी और सस्ती टिप्पणियों को अपने शौर्य प्रदर्शन के रूप में लिया जाने लगा है।

ऐसे शब्द प्रयोग आम जनता में ऐसे नेता की लोकप्रियता जल्दी बन जाती है। लेकिन अक्सर ऐसे नेताओं की काट ज्यादा तीखी और ज्यादा सस्ती टिप्पणी करने वाले नेताओं में देखी जाती है जिससे यह चलन राजनीति का स्तर गिराता चला जाता है। कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो ऐसी भाषा के इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं। अक्सर वे ऐसे बयान से राजनीति का ताप बढ़ाते भी रहे हैं। अन्य पार्टियों को भी ऐसे मामलों लिप्त पाया जाता है, लेकिन राहुल गांधी ने अब अपना निश्चित नजरिया बताकर न केवल अपनी पार्टी के ऐसे नेताओं को आगाह किया है बल्कि देश की राजनीतिक संस्कृति में भी सुधार की एक महत्वपूर्ण पहल की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य पार्टियों के महत्वपूर्ण नेता इस पहल की अहमियत को समझते हुए अपने अनुकूल रुख से इसे मजबूती देंगे। जिससे चुनाव आयोग या किसी एनी संस्था को ऐसे आदेश जारी न करना पड़े कि इस शब्द का इस्तेमाल न करें क्योंकि यह आशोभनीय है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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