अमित शाह के खिलाफ सुनवाई कर रहे जज की मौत संदिग्ध: THE KARVAN PATRIKA

Tuesday, November 21, 2017

नई दिल्ली। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में अमित शाह के खिलाफ सुनवाई कर रहे विशेष सीबीआई कोर्ट के जज बृजगोपाल लोया की अचानक हुई मौत पर अब सवाल उठाया गया है। द कारवां पत्रिका ने इसे संदिग्ध मौत बताया है। जज बृजगोपाल लोया के परिवारजनों के बयान सामने आए हैं जिसमें वो मौत पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। बता दें कि जज बृजगोपाल लोया ने अपनी मृत्यु के कुछ रोज पहले ही अमित शाह को कड़ी फटकार लगाई थी। जज बृजगोपाल लोया की मृत्यु के बाद जो नए जज आए उन्होंने अमित शाह और कई अन्य लोगों को बरी कर दिया एवं सीबीआई ने इस फैसले को चुनौती भी नहीं दी। जज बृजगोपाल लोया की मौत को करीब 3 साल बीत चुके हैं। 

ज्ञात हो कि लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी, जिसकी वजह दिल का दौरा पड़ना बताया गया था। वे नागपुर अपनी सहयोगी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए हुए थे। द कारवां की इस रिपोर्ट में उनके परिजनों की ओर से कई सवाल उठाए गए हैं, जैसे-
लोया की मौत के समय को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु का समय 1 दिसंबर 2014 को सुबह 6:15 बजे दर्ज है, जबकि परिजनों के मुताबिक उन्हें 1 तारीख़ को सुबह 5 बजे फोन पर उनकी मृत्यु की सूचना दी गई थी।

लोया की मौत दिल के दौरे से होना बताया गया, जबकि परिजनों ने उनके कपड़ों पर खून के धब्बे देखे थे।
लोया के पिता के अनुसार उनके सिर पर चोट भी थी।
परिवार को लोया का फोन मौत के कई दिन बाद लौटाया गया, जिसमें से डाटा डिलीट किया गया था।
बताया गया कि रात में दिल का दौरा पड़ने के बाद नागपुर के रवि भवन में ठहरे लोया को ऑटो रिक्शा से अस्पताल ले जाया गया था। 
लोया की बहन ने रिपोर्टर से बात करते हुए पूछा कि क्या इतने वीआईपी लोगों के ठहरने की व्यवस्था होने के बावजूद रवि भवन में कोई गाड़ी नहीं थी, जो उन्हें अस्पताल ले जा सकती थी।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रवि भवन से सबसे नज़दीकी ऑटो स्टैंड की दूरी दो किलोमीटर है। ऐसे में आधी रात को ऑटो मिलना कैसे संभव हुआ।

एक सवाल ईश्वर बहेटी नाम के आरएसएस कार्यकर्ता पर भी उठाया गया है। इसी कार्यकर्ता ने लोया की मौत के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव ले जाने की जानकारी परिजनों को दी, साथ ही लोया का फोन भी परिवार को बहेटी ने ही लौटाया था। 
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हर पन्ने पर एक व्यक्ति के दस्तखत हैं, जिसके नीचे मृतक से संबंध मराठी में ‘चचेरा भाई’ लिखा है, लेकिन परिवार का कहना है कि परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति ही नहीं है। 
रिपोर्ट कहती है कि लोया की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, तो फिर पोस्टमॉर्टम की ज़रूरत क्यों पड़ी?
इसके अलावा पोस्टमॉर्टम के बाद पंचनामा भी नहीं भरा गया।

लोया की मौत के 29 दिन बाद आए जज ने इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को मामले की सुनवाई शुरू हुए बिना ही बरी कर दिया। उसके बाद आज तक इस मामले में 11 अन्य लोग, जिनमें गुजरात पुलिस के आला अधिकारी भी हैं, को बरी किया जा चुका है। गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की जांच संभाल रही प्रमुख संस्था सीबीआई ने इस फैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं की है।

इससे पहले जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए गये थे, तब दो बातें स्पष्ट रूप से कही गयी थीं, पहली- इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर हो, दूसरी- एक ही जज इस जांच को शुरू से अंत तक देखे लेकिन शीर्ष अदालत के दूसरे आदेश की अवहेलना हुई। मामले की जांच की शुरुआत जज जेटी उत्पत ने की, लेकिन अचानक वे इससे हट गये।

6 जून 2014 को जज उत्पत ने अमित शाह को इस मामले की सुनवाई में उपस्थित न होने को लेकर फटकार लगायी और उन्हें 26 जून को पेश होने का आदेश दिया लेकिन 25 जून को 2014 को उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया। 

इसके बाद बृजगोपाल लोया आये, जिन्होंने भी अमित शाह के उपस्थित न होने पर सवाल उठाये। उन्होंने सुनवाई की तारीख 15 दिसम्बर 2014 तय की, लेकिन 1 दिसम्बर 2014 को ही उनकी मौत हो गयी। 

उनके बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट में यह मामला जज एमबी गोसवी देख रहे हैं, जिन्होंने दिसम्बर 2014 के आखिर में अमित शाह को इस मामले से बरी करते हुए कहा कि उन्हें अमित शाह के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला।

द कारवां की रिपोर्ट में लोया की बहनों और पिता के बयान शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार लोया की पत्नी शर्मिला और बेटे अनुज ने इस रिपोर्टर से बात करने से मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार उन्हें अपनी जान का खतरा था।

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