केन्द्र की नीति और किसान पुत्र शिवराज जी से गुहार | EDITORIAL

Monday, November 27, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। अपने को किसान पुत्र कहने वाले मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री आपके ध्यान में यह तथ्य आना जरूरी है कि केंद्र सरकार खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी करने और दालों पर निर्यात प्रतिबंध समाप्त करने जैसे इरादे कर रही है। उसका मंसूबा इन जिंसों की कमजोर कीमतों को बढ़ाकर किसानों को लाभ पहुंचाने का है। किसान को तो इससे कोई फायदा होता नहीं दिखता। अगर आप समझा सकें तो समझाइए कि इन फसलों का ज्यादातर हिस्सा खरीफ के मौसम में उत्पादित होता है और उसकी कटाई पहले ही हो चुकी है। औनेपौने दाम पर किसान उनका सौदा भी कर चुके हैं। किसानों को इसका लाभ तब मिलता जबकि ये निर्णय बुआई के पहले लिए गए होते। इससे वे इन फसलों का रकबा बढ़ा सकते थे या कम से कम फसल कटाई के समय ही उनको इनकी बेहतर कीमत मिल पाती। इस समय कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी व्यापार और प्रसंस्करण उद्योग को लाभान्वित करेगी। उन किसानों को कुछ नहीं मिलेगा जिनके रेडियो पर आप जान की बाज़ी लगा देने की बात कहते है। आप खुद भी समझें और अगर प्रधानमंत्री आपकी बात माने तो उन्हें भी समझाएं।

वैसे तिलहन और दलहन इकलौती ऐसी फसल नहीं हैं जिनकी कीमतों में गिरावट आई है। अधिकांश कृषि जिंसों की कीमतें पिछले साल हुए बंपर उत्पादन के बाद से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे रही हैं। कुछ मामलों में कीमतें उत्पादन मूल्य से भी कम हो गईं। कीमतों में आई यह गिरावट इस वर्ष भी जारी रही, हालांकि उड़द और कपास को छोड़कर अधिकांश खरीफ फसलों का उत्पादन या तो पुराने स्तर पर बरकरार रहा या गिरा। इसका दोष सरकार की गलत कृषि मूल्य निर्धारण नीतियों को भी जाता है जो मोटे तौर पर मुद्रास्फीति प्रबंधन से संबंधित हैं। इसे गत वर्ष 2.3 करोड़ टन की जरूरत के मुताबिक उत्पादन के बावजूद 50 लाख टन दालों के आयात से भी समझा जा सकता है। जरूरत से ज्यादा आपूर्ति ने कीमतों को प्रभावित किया। कमजोर कीमतों के चलते किसानों को लगभग 40000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। बताया जाता है कि यह आकलन करते वक्त एमएसपी और मौजूदा थोक कीमतों को ही ध्यान में रखा गया है। बहरहाल, वास्तविक नुकसान ज्यादा हो सकता है क्योंकि अनेक किसानों को अपनी उपज को आधिकारिक थोक कीमतों से कम में बेचना पड़ा है, क्योंकि उनको अपनी नकदी संबंधी जरूरतों को पूरा करना था। 

यह बात समयोचित है अब कृषि मूल्य और व्यापार को लेकर स्थिर नीतियां बनाई जाएं। इसमें आयात और निर्यात भी शामिल हैं। इसमें बाजार की मांग और कीमतों के अनुरूप उत्पादन करने की इजाजत भी शामिल है। फिलहाल नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा। इस दिशा में कुछ उम्मीद सरकार के हालिया निर्णय से भी उपजती है जहां उसने एक फॉर्मूला विकसित करने की बात कही है ताकि कृषि आयात और निर्यात पर शुल्क बढ़ाने और घटाने का काम थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर किया जाए। इस मुद्दे को दमदार तरीके से किसानों के मसीहा के रूप में उभर रहे शिवराज जी आपसे अधिक अच्छे तरीके से कोई नहीं उठा सकता। इससे कुछ सार्थक हो सकता है, सोचिये।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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