काला धन: कौन जाने क्या होगा आगे ?

Sunday, November 12, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। बड़ी मुसीबत है। नोट बंदी का का घाव अभी ताज़ा है। सरकार काले धन के खिलाफ अपने अभियान का का दूसरा भाग लाने के मंसूबे बांध रही है। नोट बंदी के नुकसान और फायदे गिनाने और उन्हें अपने तरीके से भुनाने की 8 नवम्बर को हुई राष्ट्रीय प्रतियोगिता, आम आदमी को और बड़े भ्रम में डाल गई है। आम आदमी को यह तय करना मुश्किल हो रहा है की वह काम कर राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान करे या चुपचाप घर बैठे। नोट बंदी को एक साल का वक्त गुजर गया। इसकी याद में केंद्र सरकार ने ‘ऐंटी ब्लैक मनी डे’ मनाया तो विपक्ष ने पूरे देश में विरोध दिवस। 500 और 1000 रुपये के नोट चलन से बाहर किए जाने के बाद से ही इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में इतनी सारी बातें कही जा चुकी हैं कि आम नागरिक के लिए इस बारे में कोई पुख्ता राय बनाना मुश्किल हो गया है। सरकार का दावा है कि इससे कालेधन पर अंकुश लगा है, टैक्स कलेक्शन का दायरा बढ़ा है और अर्थव्यवस्था डिजिटल हुई है। विपक्ष इसे विनाशकारी आर्थिक नीति बता रहा है। 

मनमोहन सिंह कैसे भी प्रधानमंत्री रहे हों, अर्थशास्त्री तो हैं। उनका कहना है कि नोट बंदी कारण नौकरियां खत्म हुई हैं और जीडीपी की दर गिरी है। इस तरह की बातें कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी कही हैं। पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने 2017 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अपना अनुमान घटाकर इसे 7.2 से 6.7 प्रतिशत पर ला दिया और इस कटौती के लिए नोट बंदी को जिम्मेदार ठहराया। कई अन्य एजेंसियों का भी यही रवैया रहा, हालांकि उनका यह भी कहना है कि लंबी अवधि में इसके फायदे देखने को मिल सकते हैं। 

याद करें तो नोटबंदी एक झटके की तरह आई थी। लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी लंबी-लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ा था। यह सब वे यह सोचकर झेल गए कि इससे काले धन के खिलाड़ियों पर अंकुश लगेगा। लेकिन जल्द ही इसकी वजह से पूरी अर्थव्यवस्था में ठहराव दिखने लगा। मांग कम हो गई, औद्योगिक उत्पादन सुस्त पड़ गया और निर्यात लगभग ठप्प हो गया।

सरकार का तर्क अब है कि नोटबंदी बुनियादी रूपांतरण का एक कदम है, भारत जैसी विशाल और जटिल इकॉनमी में इसके नतीजों को जमीन पर उतरने में थोड़ा वक्त लगेगा, पर कितना ? इस पर सरकार मौन है। नोटबंदी ने लेन-देन और कारोबार के चरित्र में परिवर्तन की प्रक्रिया में बदलाव आ रहा है। इसकी वजह से न सिर्फ बैंक खातों की संख्या बढ़ी है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी चेक, क्रेडिट-डेबिट कार्ड, ऑनलाइन मनी ट्रांसफर और ई-वॉलेट के इस्तेमाल में तेजी आई है, सरकार इसे अपने मुकुट की कलगी मान रही है। अर्थव्यवस्था में बहुत सारी प्रक्रियाएं पारदर्शी हुईं हैं, जिससे कई तरह की गड़बड़ियां दूर हुई हैं। 

नोटबंदी ने पहली बार आम लोगों को भी अहसास कराया कि पैसा घर में रखने की चीज नहीं, उसे बाजार में लगाए रखने में ही समझदारी है। इस सब के बावजूद सरकार को लोगों की शिकायतें गौर से सुननी चाहिए।किसी भी प्रकार के नये प्रयोग से पहले, काले धन के खिलाफ अपने अभियान का का दूसरा भाग लाने के पहले यह बहुत जरूरी है कि आम आदमी समझ सके कि उसके साथ क्या होने जा रहा है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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