10 रुपए कमीशन के लालच में होता है करोड़ों का चावल घोटाला | BALAGHAT NEWS

Monday, November 13, 2017

आनंद ताम्रकार/बालाघाट। राशन की दुकानों या छात्रावासों से अक्सर घटिया चावल की शिकायतें आतीं हैं। कई बार आक्रोशित जनता राशन की दुकान के संचालक या विक्रेता पर अपना गुस्सा भी निकाल देती है परंतु इसके लिए वो जिम्मेदार नहीं होते। मध्यप्रदेश में सरकारी तंत्र के माध्यम से वितरित हो रहे घटिया चावल का घोटाला तो मात्र 10 रुपए के कमीशन के लालच में होता है। सरकार मंडियों में किसानों से बढ़िया क्वालिटी की धान खरीदती है लेकिन 10 रुपए क्विंटल कमीशन देकर काले कारोबारी धान से निकलने वाले चावल को ब्रांडेड कंपनियों के हवाले कर देते हैं और यूपी/बिहार की मंडियों में बिना बिका छूट गया घटिया चावल खरीदकर सप्लाई कर देते हैं। 

कहां और किसे दी गई है जिम्मेदारी
मध्यप्रदेश में समर्थन मूल्य पर सर्वाधिक धान बालाघाट जिले में किसानों से खरीदी जाती है बालाघाट जिला प्रदेश का प्रमुख धान उत्पादक जिला है। गत वर्ष 2016-17 में 31 लाख क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर सहकारी समितियों के माध्यम से खरीदी की गई थी जिस पर 500 करोड रूपये का भुगतान किया गया। समर्थन मूल्य पर खरीदी गई धान को गोदामों में ओपन केप में भण्डारित करने तथा धान को कस्टम मिलिंग के माध्यम से चावल बनाने की प्रक्रिया मध्यप्रदेश राज्य विपणन संघ (मार्कफेड) के माध्यम से की जा रही है। कार्यो को सम्पादित करने के लिये धान तथा चावल का परिवहन तथा कस्टम मिंलिंग के लिये राईस मिलर्स से अनुबंध किये जाने का दायित्व मार्कफेड बालाघाट को सौंपा गया है।

किस कारोबारी से कितना कमीशन 
इन कार्यों की आड में जिला विपणन अधिकारी एवं लेखा अधिकारी की सांठगांठ से खुलेआम कमिशनबाजी का आरोप सुर्खियों में है। कस्टम मिंलिंग किये जाने के लिये जिले के राईस मिलर्स से 5 रू./क्विटंल तथा जिले के बाहर के राईस मिलर्स से 10 रू.प्रति क्विंटल की दर से कमिशन वसूला जा रहा है। यदि एक साल का कुल अनुमान लगाया जाए तो केवल कमीशन की रकम 2 से 3 करोड़ रुपए के बीच हो जाती है। इस कमीशन के कारण ही शुरू होता है सरकारी गोदामों में घटिया चावल का खेल। 

ट्रांस्पोर्टेशन के बिल भी फर्जी
कमिशन लेने के बाद अनुबंध करने वाले राईस मिलर्स को अवैधानिकता करने की खुली छुट दी जाती है जिले में तथा जिले के बाहर की उन राईस मिलों से अनुबंध किया जा रहा है जो बंद पडी है तथा उन मिलर्स पर महाराष्टृर सरकार का करोडो रूपये बकाया है। मिलर्स गोदामों और ओपन केप से धान उठाने के बाद उसके रिलिज आर्डर खुले बाजार में बेच देते है तथा धान का परिवहन का फर्जी बिल बनाकर ट्रक भाड़ा भी मार्कफेड से वसूल कर रहे है।

कमीशन के लालच में महाराष्ट्र के मिलर्स को प्राथमिकता
यह उल्लेखनीय है कि जिला विपणन अधिकारी बालाघाट जिले के राईस मिलर्स की बजाये जिले के बाहर महाराष्ट्र के राईस मिलर्स से अनुबंध करने में विशेष रूची लेते है क्योंकि स्थानीय मिलर्स से 5रू. क्विंटल की बजाये जिले के बाहर के राईस मिलर्स 10 रू. प्रति क्विंटल की दर से कमिशन लिया जा रहा है। जिला विपणन अधिकारी द्वारा यह बताया जाता है कि जिले के मिलर्स की क्षमता कम होने के कारण बाहर के मिलर्स को कस्टम मिंलिंग के लिये अनुबंधित कर उन्हें धान दी जा रही है। 

यूपी बिहार का चावल सप्लाई कर देते हैं काले कारोबारी
जिले के बाहर के मिलर्स भी गोदामों तथा ओपन केप से धान उठाकर स्थानीय उश्णा मिलों तथा खुले बाजार में धान बेच देते है तथा यूपी बिहार से चावल बुलवाकर नागरिक आपूर्ति निगम को चावल प्रदाय कर रहे है।

चावल उद्योग महासंघ की मांग पर ध्यान ही नहीं दिया
मध्यप्रदेश चावल उद्योग महासंघ के कार्यवाहक अध्यक्ष गंभीर संचेती ने बताया की उन्होने जुलाई 2017 में राईस मिलर्स के प्रतिनिधि मण्डल के साथ कलेक्टर बालाघाट एवं मध्यप्रदेश राज्य विपणन संघ के प्रबंध संचालक को ज्ञापन देकर जिले के राईस मिलर्स को कस्टम मिंलिंग के कार्य में प्राथमिकता दिये जाने का निवेदन किया गया था लेकिन उनकी मांग पर कोई ध्यान नही दिया गया।

मार्कफेड भोपाल के नाम पर वसूला जाता है कमीशन
इस तरह समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी और कस्टम मिंलिंग के माध्यम से चावल बनाने के लिये अनुबंध करने की आड में राईस मिलर्स से करोडों रूपयों का कमिशन वसूला जा रहा है।
राईस मिलर्स से कहा जाता है कि कमिशन का बंटवारा जिले के आला अफसरों से लेकर मार्कफेड के भोपाल मुख्यालय के अधिकारियों तथा मंत्रीयों तक भिजवाया जा रहा है।

जिम्मेदारों की चुप्पी संदेह पुख्ता करती है
इस तरह की गतिविधियों की जांच करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है एवं स्थानीय मिलर्स को न्याय दिलाने का जिम्मा जिन नेताओं पर सौंपा गया है वो भी चुप हैं। अत: संदेह पुख्ता होता है कि कमीशन का एक हिस्सा उनके पास भी पहुंच रहा होगा। अब देखना यह है कि विभागीय मंत्री एवं मार्कफेड के भोपाल में बैठे अधिकारियों की तरफ से क्या इस मामले में कोई संवेदनशील कदम उठाया जाता है। 

चावल खत्म तो सबूत भी खत्म
दुनिया का कोई भी घोटाला हो उसके सबूत शेष रह ही जाते हैं परंतु यह एक ऐसा परंपरागत घोटाला है जिसके सबूत हर साल अपने आप नष्ट हो जाते हैं। कारोबारी को बढ़िया धान दी और 10 रुपए कमीशन ले लिया। अब सरकारी आखें बंद। कारोबारी ने घटिया चावल गोदामों में जमा करा दिया। गोदामों से निकला चावल जिलों में वितरित हुआ। इधर जिलों में चावल खत्म हुआ तो सबूत अपने आप खत्म। परंपरागत घोटाला की एक सरकारी कड़ी कहती है गोदाम में झाडू लगने के बाद तो सीबीआई भी नहीं पकड़ सकती क्या खेल हो गया। 

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