सामाजिक समरसता का मखौल उड़ाती ये चिंताजनक घटनायें

Sunday, October 8, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। शायद ही कोई समाजशास्त्री इन घटनाओं के कारणों की तार्किक परिणति पर रोशनी डाल सके कि गाँधी के गुजरात और शांति के टापू मध्यप्रदेश में दलित उत्पीड़न की घटनाएँ क्यों बढ़ रही है ? आलोचना ओर राजनीति करने वालों के इशारे हमेशा सरकार की तरफ होते हैं, इस बार भी हैं। यहाँ सवाल दूसरा है कि ऐसा कुछ न घटे इसके लिए क्या करें ? गुजरात के आणंद जिले में एक दलित युवक को सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि वह गरबा देख रहा था। इससे पहले पिछले हफ्ते ही गांधीनगर के एक गांव में दो दलित युवकों पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि उन्होंने मूंछें रखी हुई थीं। जब इस घटना की पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई तो एक युवक पर दोबारा ब्लेड से हमला किया गया। इतना ही नहीं, इस घटना के विरोध में वॉट्सऐप पर मि. दलित नाम से एक मुहिम शुरू हुई, जिसके तहत अकड़ी हुई मूंछों के नीचे लिखे मि. दलित को प्रोफाइल पिक बनाया जाने लगा, तो इस मुहिम से जुड़ने वालों पर भी हमले हुए। 

दलित विरोधी हिंसा के ये मामले सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं हैं। मध्यप्रदेश के गुना जिले में पहले एक दलित पर दाल चुराने का आरोप लगाकर उसे अपशब्द कहे गए और उसके साथ मारपीट की गई। फिर जब उसने इसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की तो उसके घर में घुसकर उसे पीट-पीट कर मार डाला गया। ऊँगली राज्य सरकारों की तरफ उठ रही है, यह स्वाभाविक भी है। सिर्फ ऊँगली दिखा देने से इस समस्या का कोई निदान नही निकलता दिख रहा है।

हजारों साल की वर्णवादी परंपरा को एक तरफ रख दें तो भी अस्सी-नब्बे के दशक तक दलित जनसंहार की खबरें बिहार और कई अन्य राज्यों से आती ही रहती थीं। मगर पिछले 2 दशकों में इन  मामलों में तथ्य कुछ अलग निकले। आर्थिक उदारीकरण से उपजे मूल्यों का दबाव कहिए या देश में आए दलित-पिछड़ा उभार का नतीजा, इस दौर में ऐसी घटनाओं में कमी तो आई ही, ऊपर संरक्षण के अभाव में ऐसी बीमार सोच वाले लगातार सफाई की मुद्रा में दिखने लगे। यह सिलसिला पिछले दो-तीन वर्षों में अचानक बदल गया है और तमाम पोंगापंथी प्रवृत्तियों की तरह ही कमजोर तबकों का उत्पीड़न भी ट्रेंडी चीज बन गया है। 

संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर पलने वाली राजनीति इन रुग्ण प्रवृत्तियों को ताकत दे रही है। दलितों के उत्पीड़न के पीछे उन्हें उनकी औकात याद दिलाने का भाव काम कर रहा है, क्योंकि ऐसा करने वालों को लगता है कि सत्ता का हाथ उनके साथ है। चिंता की बात यह है कि उन्हें गलत साबित करने की कोई तत्परता न तो सत्तारूढ़ ताकतों में है और न सिर्फ हल्ला मचाते प्रतिपक्ष में, मीडिया अपने खबरची धर्म की पूर्ति करता है पर अन्य बौद्धिक समुदाय जैसे विश्वविद्यालय और उनसे जुड़ें सामजिक चेतना केंद्र सुप्त हैं। राजनीति करने वाले इसे वोट के नजरिये से तौल रहे है। जिन राज्यों में सामाजिक समरसता अभियान जारी है, उनसे ऐसी खबरें आना यह साबित करता है की अभियान अपने लक्ष्य की और अत्यंत धीमी गति से चल रहा है। सबको मिलकर फौरन उपाय खोजना होंगे। जो बहुत जरूरी है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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