इंदौर में त्यौहार पर महामारी, एक साथ 5 संक्रामक वायरस का हमला

Monday, October 9, 2017

सुमेधा पुराणिक/इंदौर। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा बीमारियों का असर इंदौर में ही है। शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्र में हर घर में एक मरीज है। कारण, शहर और प्रदेश में पहली बार एक साथ पांच तरह के वायरस ने हमला कर दिया है। इससे महामारी जैसे हालात हैं। इंदौर में ही इतने भयावह स्थिति क्यों है? इसके जवाब में स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है इन दिनों असामान्य तापमान से शहर की हवा में अलग-अलग तरह के वायरस फैले हुए हैं। पहले एंफ्लूएंजा वायरस आया, फिर स्वाइन फ्लू ने हमला किया। इनके लौटने के पहले ही

चिकनगुनिया ने दस्तक दे दी, जिसमें लोग असहनीय जोड़ों का दर्द, तेज बुखार और थकान से पीड़ित हैं। ये गंभीर वायरस खत्म भी नहीं हुए कि आंखों पर आक्रमण करने वाला संक्रमण शहर में आ गया। डॉक्टर भी इन दिनों मरीजों की भीड़ देखकर हैरान हैं। 2012 में चार तरह के वायरस थे, लेकिन इस साल स्वाइन फ्लू ने भी शहर को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है।

इंदौर शहर या आसपास के गांवों में लगभग हर परिवार में कोई न कोई सदस्य बीमार है। इसकी वजह है वायरस को शहर का तापमान और वातावरण रास आ गया है। अब तो शहर में गंदगी भी कम हो गई और सरकारी अमला जगह-जगह मच्छर मारने की दवा भी छिड़क रहा है।

इसके बावजूद डॉक्टरों के यहां वायरस से संक्रमित मरीजों की भीड़ है। घर में एक व्यक्ति के चपेट में आते ही पूरा परिवार बीमार हो रहा है। उधर, शहर से सटे उज्जैन सहित जबलपुर, ग्वालियर, भोपाल, रीवा सहित अन्य शहरों में वायरस का इतना प्रकोप नहीं है। डॉक्टर भी इसे मान रहे हैं। इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए 'नईदुनिया" ने विशेषज्ञों से चर्चा की।

इंदौर में है यह सब कुछ, इसलिए नहीं लौट रहे वायरस
व्यापारिक राजधानी होने से सबसे ज्यादा बाहरी प्रदेशों से लोगों का आना-जाना चलता है। लोग ठंडे प्रदेशों से वायरस साथ लाते हैं।
इस बार शहर में ज्यादातर समय मौसम में ठंडक रही। इन वायरस को ठंडक ज्यादा पसंद है। ठंडक में कई गुना ये बढ़ते जाते हैं।
सबसे अहम बात है ये वायरस सुस्त रहते हैं यानी चलायमान नहीं होने से एक ही जगह कई दिनों तक ठहरे रहते हैं।
इन्हें रोशनी बिलकुल पसंद नहीं। रात के अंधेरे में ज्यादा पनपते हैं और दिन में लोगों को शिकार बनाते हैं।
वायरस को जीने के लिए ऑक्सीजन काफी कम मात्रा में लगती है। इससे इनका जीवन लंबा रहता है।

सांसों से एक से दूसरे में फैलते हैं
स्वाइन फ्लू, डेंगू, चिकनगुनिया के वायरस सांसों से एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं। परिवार में एक व्यक्ति की चपेट में आने पर दूसरे लोग उसके आसपास रहते हैं तो वे भी चपेट में आ जाते है। जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, उन्हें तुरंत चपेट में ले लेते हैं।

समय के विपरीत दी दस्तक
डॉक्टरों के मुताबिक इस समय शहर में महामारी जैसे हालात हैं। डॉ. संजय लोंढे के अनुसार सामान्य तौर पर प्रत्येक वायरस का अलग-अलग समय रहता है। स्वाइन फ्लू जनवरी-फरवरी में दस्तक देता है, लेकिन इस वर्ष अगस्त-सितंबर से ही फैल गया। इसी तरह कंजक्टिवाइटिस जुलाई-अगस्त में रहता है, लेकिन यह अक्टूबर में फिर से आ गया।

ये है स्थिति
स्वाइन फ्लू की चपेट में आए 110 (इंदौर शहर के 54)
स्वाइन फ्लू से मौत 034 (इंदौर शहर के 20)
डेंगू की चपेट में आए 39
चिकनगुनिया की चपेट में आए10
कंजक्टिवाइटिस से पीड़ित 100 से ज्यादा
एंफ्लुएंजा वायरस (शरीर पर लाल चकते) से पीड़ित- 25 हजार
(इनसे कई गुना अधिक मरीज ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं आई, लेकिन ऐसे ही लक्षणों वाले संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं।)

पटाखों से संक्रमण कम होने की उम्मीद
विशेषज्ञों के मुताबिक दीपावली पर जो पटाखे जलेंगे उसके बारूद और धुएं से संक्रमण कम होने की संभावना है। वातावरण में गर्मी बढ़ने से वायरस जलता है। यह आने वाले दिनों के लिए अच्छे संकेत हो सकते हैं।

सालों बाद खतरनाक स्थिति
इस बार संक्रमण अलग ही रूप में नजर आ रहा है। तीन-चार महीने से लगातार एक समान मरीजों की संख्या बनी हुई है। शहर का वातावरण वायरस के लिए सकारात्मक होने से ये फैल रहे हैं। इसकी मुख्य वजह तापमान में कमी और नमी भी है। तापमान बढ़ने पर वायरस कम हो सकता है। हमने सालों बाद यह खतरनाक स्थिति देखी है। 
डॉ. संजय लोंढे, 
दमा व एलर्जी रोग विशेषज्ञ

शहरवासी भी हों जागरूक
मैं करीब चार साल बाद संक्रमण का यह विकराल रूप देख रहा हूं। इस बार संक्रमण की तीव्रता बहुत ज्यादा है, जबकि तुलनात्मक रूप से लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है। इसमें खराब पहलू यह है कि लोग खुद भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। बीमार होकर कई दिन तक बिस्तर पर पड़े रहने के बाद भी जागरूकता के लिए कुछ नहीं करते। मरीज या इनके परिजन क्षेत्र में जल जमाव वाले गड्ढे खाली कर दें या घरों में पुराने कूलर, गमले या टायर से पानी फेंकने की समझाइश दें तो लार्वा कम हो सकता है। 
डॉ. सलिल भार्गव छाती रोग विशेषज्ञ

बारिश की अनियमितता से बढ़ा संक्रमण
इस साल अनियमित बारिश से संक्रमण को ज्यादा से ज्यादा फैलने में मदद मिली। एक बार बारिश होने के बाद कई दिनों तक थम जाती थी। लगातार बारिश होती तो सभी वायरस निकल जाते। इस वर्ष अलग-अलग तरह के कई संक्रमण एक साथ देखने को मिले। कुछ दिनों से तापमान अधिक बना हुआ है। इससे उम्मीद है कि एकाध हफ्ते में संक्रमण का प्रभाव कम हो जाएगा। 
डॉ. आशा पंडित स्वास्थ्य अधिकारी, इंदौर

संक्रमण पर अध्ययन जरूरी
सालों बाद ऐसी स्थिति देखी है। सबसे बड़ी समस्या है कि यह कौन सा संक्रमण है, समझ नहीं आ रहा। हवा से यह संक्रमण फैल रहा है। सभी रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद मरीज की स्थिति बिगड़ रही है। इस पर मेडिकल कॉलेज को अध्ययन करना चाहिए कि यह नए तरह का वायरस कौन सा आ गया है। इसका सटीक उपचार क्या हो सकता है। 
डॉ. हेमंत द्विवेदी शिशु रोग विशेषज्ञ

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