कहीं नाना पाटेकर ना बन जाए कंगना: फिल्म समीक्षा

Saturday, September 16, 2017

प्रवीण दुबे। कंगना की पूर्ववर्ती फिल्मों की तुलना में कमज़ोर है फिल्म सिमरन। रियल लाइफ गैम्बलिंग क्वीन संदीप कौर के कारनामों पर आधारित इस फिल्म में जो कुछ भी है सब कंगना ही कंगना है। फिल्म की पूरी शूटिंग अमेरिका के अटलांटा शहर में हुई है। कंगना एक बाग़ी तेवर वाली बिंदास और महत्वाकांक्षी तलाकशुदा लड़की के किरदार में हैं, जिसके लिए कोई सामाजिक वर्जना मायने नहीं रखती। वो बिंदास शराब पीती है, जुआ खेलती है, सेक्स के दौरान प्रोटेक्शन को वरीयता देती है।

इस फिल्म में कंगना खुद को ही दोहराती हुई सी दिखी हैं। हंसल मेहता निर्देशित और अपूर्व आसरानी की लिखित इस कहानी में प्रवाह बहुत धीमा है। इंटरवल के पहले कहानी लगभग सरकती हुई सी है। अव्वल तो कहानी ही बहुत दमदार सी नहीं लगी मुझे। एक जो सबसे बड़ा ख़तरा मुझे व्यक्तिगत तौर पर लग रहा है क्यूंकि मैं कंगना का मुरीद हूँ, वो ये कि कंगना कहीं नाना पाटेकर न बन जाए। नाना पाटेकर को लोग बेहद पसंद करते थे क्यूंकि व्यवस्था के खिलाफ आग उगलता कैरेक्टर वो करते थे लेकिन जब उनकी हर फिल्मों में कैरेक्टर का दोहराव हद से ज्यादा हो गया तो, लोग ऊबने लगे। 

कंगना भी अपनी हर फिल्म में लगभग ऐसे ही बागी तेवर वाली लड़की का किरदार अदा कर रही हैं। कमोबेश निजी ज़िंदगी में भी वो ऐसे ही तेवर रखती हैं। इस सबके बावज़ूद परदे में आग लगा देने लायक़ अभिनय क्षमता तो उनके अंदर है ही। एक-एक द्रश्य में जान डाल देने का उनका हुनर तो वाकई क़माल का है और यही उनकी पहचान है। बाकी के सारे कलाकार को वो उसी तरह निगल जाती हैं, जैसा किसी दौर में अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों में निगलते थे। गाने अच्छे हैं, एक्टिंग भी अच्छी है। कंगना का नाम ही क़ामयाबी की जमानत है इस फिल्म के लिए। 

हालांकि हैरत है कि अमेरिका के अटलांटा शहर की पुलिस को इस फिल्म में इतना कमज़ोर दिखाया गया है, जितनी हमारे यहाँ मंडला, डिंडोरी या झाबुआ की पुलिस की भी नही होगी। कोई लड़की दनादन बैंक लूटती रहे और पुलिस पकड़ न पाए, ये यकीन से परे लगता है। कुल मिलाकर कंगना के काम को पसंद करने वालों के लिए अच्छी है फिल्म लेकिन मेरी राय है कि चरित्र का ऐसा दोहराव कंगना के कैरियर के लिए शायद अच्छा नहीं होगा। यदि दोहराव करना भी है, तो कहानी को बढ़िया से विविधता के साथ कसना होगा। लड़कियों के बोल्ड और वर्जनाओं को तोड़ते देखते किरदार यदि आपको पसंद आते हैं तो देखिए वर्ना कोई बात नहीं। 
लेखक श्री प्रवीण दुबे ईटीवी मध्यप्रदेश के सीनियर एडिटर हैं। इससे पहले नई दुनिया और दैनिक भास्कर को सेवाएं दे चुके हैं। 

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