70 बरस बाद भी हम हिंदी को राष्ट्र भाषा नहीं बना सके !

Thursday, September 14, 2017

आज फिर 14 सितम्बर अर्थात हिंदी दिवस है। 1947 से 2017 आ गया, देश का दुर्भाग्य है उसकी कोई अधिकृत राष्ट्रभाषा नहीं हैै। जब अंग्रेजों का राज्य था तब भी और अब भी और भारत में अधिकांश लोग हिंदी बोलते ही नहीं, हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं। इस व्यापक समर्थन के बावजूद सरकार है कि इसे राष्ट्रभाषा मानने को तैयार नहीं। देश की सर्वाधिक जनसंख्या हिंदी समझती है और अधिकांश देशवासी हिंदी बोल लेते हैं, लेकिन फिर भी हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। 

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा मिली सूचना के अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की 'राजभाषा' यानी राजकाज की भाषा मात्र है। भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है। कई नागरिक अभी भी राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए संघर्षरत हैं। सरकारी जबाब का आलम यह है की साल 1947 से वित्तीय वर्ष 2012-13 तक देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी मांगने पर सूचना की कई अर्जियां प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, राजभाषा विभाग से मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, केंद्रीय हिंदी संस्थान मैसूर और केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली के जन सूचना अधिकारियों के पास लंबित है। वे जवाब नहीं देना चाहते। 

इस टालमटोली का एक बड़ा कारण सरकारी नीति की अस्पष्टता है। अब सरकार को गुजरात हाईकोर्ट का कोई निर्णय भी याद आने लगा है। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली भारत सरकार इतने बरस बाद भी देश की राष्ट्रभाषा और उसके प्रचार-प्रसार की कोई नीति नहीं पाई है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों अनुसार वर्ष 1947 से वित्तीय वर्ष 2016-17 तक विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी भारत सरकार के पास नहीं है। 

कितना दुखद है कि हिंदी के नाम पर हर वर्ष 14 सितम्बर वक्तव्य देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री राष्ट्र के नायक कर लेते हैं। भारत सरकार के पास विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की भी  वर्षो की कोई जानकारी नहीं है। जब तक हिंदी राष्ट्र भाषा तय नहीं होती तब तक कोई कुछ कर भी क्या सकता है? विदेश में हिंदी प्रसार प्रचार के मामले में भी सरकार का हाथ तंग है। 

भारत सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 1984-85 से वित्तीय वर्ष 2012-13 की अवधि में विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार द्वारा सबसे कम 562000 रुपये वर्ष 84-85 में और सर्वाधिक 68548000 रुपये वर्ष 2007-08 में खर्च किए गए। वर्ष 2012-13 में इस मद में अगस्त 2012 तक 5000000 रुपये खर्च किए गए थे। इसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नही है। अब सवाल यह है कि इसमें सरकार की रूचि क्यों नहीं है ? घूमफिर कर उत्तर सामने आता है वोट बैंक। राजनीतिक दल ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते जिससे उनका वोट बैंक प्रभावित होता हो।

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