RTI: लोकसेवकों के अवकाश आवेदन निजता का मौलिक अधिकारी, जानकारी नहीं दे सकते

Tuesday, August 29, 2017

भोपाल। मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग ने एक अहम फैसले में अभिनिर्धारित किया है कि सूचना के अधिकार के तहत लोक सेवकों के अवकाश व उपस्थिति संबंधी जानकारी दी जानी चाहिए, लेकिन अवकाश आवेदनों की नकलें देना बाध्यकारी नहीं है। निजता के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए अवकाश के व्यक्तिगत कारणों का खुलासा तब तक नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि कोई अपरिहार्य स्थिति या व्यापक लोकहित की परिस्थिति उत्पन्न न हो। 

राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने एक न्यायाधीश की अपील खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। फैसले में कहा गया है कि अपीलार्थी न्यायाधीश ने सभी न्यायाधीशों के अवकाश आवेदनों की प्रमाणित प्रतिलिपियां नहीं दिए जाने के लोक सूचना अधिकारी /न्यायालय अधीक्षक एवं अपीलीय अधिकारी/जिला व सत्र न्यायाधीश के निर्णय को चुनौती दी है और उक्त प्रतिलिपियां दिलाने की मांग की है। इसे इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि न्यायाधीशो द्वारा अपने अवकाश आवेदन पत्रों में अवकाश लेने के व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया है। इनकी जानकारी देने से उन व्यक्तिगत कारणों का सार्वजनिक प्रकटन होगा जिससे न्यायाधीशों की निजता/एकांतता का हनन होगा। अवकाश आवेदनों की जानकारी न तो लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंधित है और न ही यह जानकारी चाही जाने का औचित्य स्वीकार किए जाने योग्य है। 

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) (जे) में स्पष्टतः प्रावधानित है कि जब तक लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी सूचना का प्रकटन विस्तृत लोकहित में न्यायोचित है, तब तक ऐसी सूचना का प्रकटन नहीं किया जाएगा जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है, जिसका प्रकटन किसी लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंध नहीं रखता है या जिससे व्यक्ति की निजता/एकांतता पर अनावश्यक अतिक्रमण होगा । 

सूचना आयुक्त ने अपीलार्थी न्यायाधीश की यह दलील भी नामंजूर कर दी कि न्यायाधीशों की मासिक बैठक में उपस्थित न हो सकने के कारण जिला व सत्र न्यायाधीश द्वारा मुझसे स्पष्टीकरण मांगा गया जिसका उत्तर पेश करने के लिए मुझे उक्त जानकारी की आवश्यकता है। आयुक्त आत्मदीप ने फैसले में कहा कि न्यायालय अधीक्षक तथा जिला व स़त्र न्यायाधीश लिखित में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अपीलार्थी न्यायाधीश से कोई स्पष्टीकरण लिया जाना और अपीलार्थी की ओर से कोई स्पष्टीकरण कार्यालय में दिया जाना लंबित नहीं है। वैसे भी बैठक में अनुपस्थित रहने के संबंध में अपीलार्थी न्यायाधीश से मांगे गए स्पष्टीकरण का अन्य न्यायाधीशों के अवकाश आवेदनों से कोई सीधा संबंध नहीं है। अपीलार्थी न्यायाधीश स्वयं के अवकाश आवेदनों और उन पर किए गए आदेशों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने हेतु लोक सूचना अधिकारी के समक्ष विधि अनुसार आवेदन प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है। आयोग ने लोक सूचना अधिकारी व अपीलीय अधिकारी के आदेश में कोई वैधानिक त्रुटि न पाते हुए उन्हें न्यायोचित करार दिया है।

यह है मामला: 
मेहगांव के व्यवहार न्यायाधीश ने सूचना के अधिकार के तहत दि. 16/02/16 को जिला व सत्र न्यायालय, भिण्ड के लोक सूचना अधिकारी से निम्न जानकारी मांगी थी - 
(1)अप्रेल 15 से फरवरी 16 तक मासिक मीटिंग में उपस्थित न्यायाधीशो का हस्ताक्षर पत्रक।
(2)अप्रेल 15 से फरवरी 16 तक जिला भिण्ड में पदस्थ सभी न्यायाधीशों के अवकाश आवेदनों एवं उनमें किए गए आदेशो की प्रतियां। 

न्यायालय अधीक्षक ने अपीलार्थी को मासिक मीटिंग में उपस्थित हुए न्यायाधीशगण के हस्ताक्षर 
पत्रक की जानकारी दे दी किन्तु सभी न्यायाधीशगण के अवकाश आवेदनों व उनमें किए गए आदेश की जानकारी देने से यह कहकर इंकार कर दिया कि धारा 8 (1) (जे) के प्रावधानों के अंतर्गत सूचना, जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है, जिसका प्रकटन किसी लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंध नहीं रखता है, की जानकारी प्रदान नहीं की जा सकती। 

अपीलीय अधिकारी/जिला व सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश दि. 08/07/16 में भी लोक सूचना अधिकारी के निर्णय से सहमत होते हुए अपीलार्थी की प्रथम अपील निरस्त कर दी गई। अपीलीय अधिकारी के आदेष में उल्लेख किया गया कि अपीलार्थी की ओर से ऐसा कोई आधार नहीं बताया गया जिससे यह कहा जा सके कि विषालतम जनहित में ऐसी सूचना का प्रकटीकरण न्यायसंगत है । बल्कि अपीलार्थी का यह आधार है कि उन्हें कार्यालय की ओर से कोई सूचना पत्र जारी किया गया है जिसका स्पष्टीकरण दिए जाने में उक्त जानकारी की आवष्यकता है। अतः स्पष्ट है कि जनहित में सूचना का प्रकटीकरण अपीलार्थी की ओर से नहीं चाहा गया है, बल्कि अपने व्यक्तिगत हित के लिए सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी चाही गई थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अपीलार्थी की ओर से कोई स्पष्टीकरण कार्यालय में दिया जाना लंबित नहीं है । इसलिए चाही गई जानकारी दिया जाना उचित नहीं है। 

उक्त आदेश को चुनौती देते हुए अपीलार्थी न्यायाधीश द्वारा सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की गई थी।  

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