कृषि: सरकार के नहीं समाज के समर्थन की दरकार

Friday, July 7, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। 3 जुलाई 17 के “प्रतिदिन” “कर्ज़ का मर्ज़ और सरकार का फर्ज़” पर प्रतिक्रिया रुकने का नाम नहीं ले रही है। जिन पाठकों ने पसंद किया उनका तो धन्यवाद। उनका ज्यादा धन्यवाद जो व्यापार में हैं, बैंक से ऋण लेना और उसे न चुकाना और किसान की भांति दीनता से नही दादागिरी से माफ़ कराना चाहते हैं, उनके लिए कोई उपमा नहीं। दर्द छोटे किसान का है, वो मध्यप्रदेश के मंदसौर का हो या किसी अन्य जिले का सबके साथ छल हुआ है। सरकार के कीर्ति मुकुट में लगी  “कृषि कर्मण” की कलगी किसान के खून से सराबोर हो रही है। हर दिन किसान आत्म हत्या कर रहे है। बिहार के बगड़िया, उत्तरप्रदेश के गोरखपुर- आजमगढ़, महारष्ट्र के नांदेड,गुजरात के हलोल,कर्नाटक के हासन से किसानों के और मुम्बई तथा अहमदाबाद से  कुछ कारखानेदारों के फोन इनमे शामिल हैं। इन फ़ोनों ने समाज में बनते नये समीकरण को समझने की जरूरत बताई।

भारतीय मनीषा कहावतों के माध्यम से अपनी बात कहती आई है। एक प्रचलित कहावत है “उत्तम खेती मध्यम वाण, अधम नौकरी,भीख निदान। आजकल यह कहावत उलटी हो गई है दश भर का अन्नदाता कर्ज़ माफ़ी की भीख मांग रहा है और जिसका फर्ज़ उसे सम्बल देने का है। वे गोली चलवा रहे हैं। उपहास  उड़ा रहे हैं। किसी ने मुझसे सवाल किया आपके पास भी तो खेती होगी। मेरा जवाब सत्य और साफ था। न तो मैं किसान हूँ और न किसान पुत्र, न ही आयकर बचाने के लिए छद्म किसान। मध्यप्रदेश के उन्नत किसान मुख्यमंत्री को मंदसौर  के किसानों में तस्कर नजर आये है। व्यापारियों की नजर उन्हें अकर्मण्य बता रही है।

दोनों आकलन ही आकलन ठीक नहीं है। निदान के लिए कर्ज़ कितना है, और क्यों है यह जानना जरूरी है। कृषि ऋण का अनुमान लगभग 26 खरब रूपये है। इसमें बीज, खाद, दवाओं की बढती कीमत, महंगी लागत और बैंक ऋण शामिल है। मौसम की नाराजी, नकली बीज के साथ बम्पर उत्पादन किसान की दुर्दशा के कारण होते हैं और होते रहेंगे। समर्थन मूल्य और ऋण माफ़ी जैसे कार्यों ने किसान को समाज से काटा। समर्थन मूल्य वातानुकूलित कमरों में वे अधिकारी तय करते हैं, जिनके पास या तो खेती नहीं है और है तो उसका आयकर छूट था श्याम को श्वेत करने से अतिरिक्त कोई अन्य प्रयोग नहीं है। किसान की मेहनत का मूल्यांकन करने के लिए कोई किसान किसी कमेटी आज तक शामिल नहीं किया गया। किसान व्यापारियों की तरह संगठित भी नहीं है। चुनाव के लिए चंदा भी नहीं दे सकते हैं।

भारत के समाज में कृषि की अनिवार्यता है। हमारी अर्थव्यवस्था इतनी सुदृढ़ नही है की पूरे देश का पेट विदेश से अनाज मंगाकर  भरा जा सके। समाज को और विशेष कर उद्द्योग जगत को विचार करना होगा कि किसान को खाली समय में उसके गाँव के नजदीक ऐसा रोजगार मिले कि उसकी रोजी और आपकी रोटी दोनों चल सकें। उसे लगातार मिलता काम उसे कर्ज़ के फंदे में फंसने से रोकेगा और उद्द्योग को श्रम आसानी से मिलेगा। सिर्फ नजरिये को बदलने की जरूरत है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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