भारत में महिलाओं के 10 प्रमुख कानूनी अधिकार

Saturday, July 22, 2017

भारत में महिलाएं खुद को कमजोर समझतीं हैं। इसीलिए वो कई बार ऐसी प्रताड़नाएं भी सहन करती रहतीं हैं जो जघन्य अपराध की श्रेणी में आतीं हैं। कई बार महिलाओं को सरकारी स्तर पर भी तंग किया जाता है। पुलिस एफआईआर नहीं लिखती। आधी रात को गिरफ्तार करने आ धमकती है। परंतु यह सबकुछ केवल उन्ही महिलाओं के साथ होना है जिन्हे अपने कानूनी अधिकार पता नहीं होते। जो महिलाएं जागरुक होतीं हैं ना तो उन्हे परिवार परेशान कर पाता है और ना ही कानून के रखवाले। आप भी इस पेज को बुकमार्क करके रख लीजिए। ताकि हमेशा काम आए। 

1-कानूनी मदद के लिए मुफ्त मिलते हैं एडवोकेट
दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश के मुताबिक आपराधिक दुर्घटना की शिकार महिला द्वारा थाने में दर्ज कराई प्राथमिकी दर्ज के बाद थाना इंचार्ज की यह जिम्मेदारी है कि वह मामले को तुरंत दिल्ली लीगल सर्विस अथॉरिटी को भेजे और उक्त संस्था की यह जिम्मेदारी है कि वह पीड़ित महिला को मुफ्त वकील की व्यवस्था कराए. सामान्यतः देखा जाता है कि महिलाएं अनभिज्ञता में अक्सर कानूनी पचड़ों में फंसकर रह जाती हैं.

2-बयान दर्ज करते समय निजता का अधिकार
सीपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) की धारा 164 के तहत बलात्कार पीड़ित महिला अंडर ट्रायल स्थिति में भी बिना किसी की मौजूदगी में सीधे जिला मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान दर्ज करवा सकती है. इसके अलावा पीड़ित महिला ऐसे अनुकूल जगहों पर भी एक पुलिस अधिकारी व महिला कांस्टेबल के सामने अपने बयान दर्ज करवा सकती है, जहां पर किसी चौथे व्यक्ति द्वारा उसके बयान को सुने जाने की संभावना न के बराबर हो. यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि पीड़ित महिलाएं बयान दर्ज करवाते समय स्ट्रेस से दूर रह सकें और कम्फर्टेबल होकर अपना बयान दर्ज करवा सकें.

3- प्राथमिकी दर्ज कराने की समय-सीमा नहीं
एक महिला के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाने की कोई समय सीमा नहीं होती और वह जब चाहे प्राथमिकी दर्ज करवा सकती है. किसी भी थाने का पुलिस अधिकारी महिला से यह कहकर रिपोर्ट दर्ज करने से मना नहीं कर सकता है कि घटना को घटित हुए काफी वक्त बीत चुका है. यानी पुलिस यह नहीं कह सकती है कि घटना को काफी वक्त हो गया और अब वह प्राथमिकी दर्ज नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के मुताबिक पुलिस को महिला की प्राथमिकी हर हाल में दर्ज करनी होगी, भले ही घटना और दर्ज कराए जा रहे प्राथमिक रिपोर्ट के बीच कितना ही फासला क्यों न हो?

4-ई-मेल व रजिस्टर्ड डाक से दर्ज होते है FIR
दिल्ली पुलिस द्वारा जारी एक गाइडलाइन के मुताबिक महिलाएं ई-मेल व रजिस्टर्ड डाक के जरिए भी अपनी शिकायत दर्ज करवा सकती है. यानी जो महिला शिकायत दर्ज करवाने सीधे पुलिस थाने नहीं जा सकती है, वो महिलाएं अपनी लिखित शिकायत ई-मेल अथवा रजिस्टर्ड डाक के जरिए उपायुक्त अथवा आयुक्त स्तर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सीधे उनके मेल आईडी अथवा पते पर भेज सकती है. जिसके बाद वह अधिकारी संबंधित इलाके के थानाध्यक्ष को प्राथमिकी दर्ज करने व शिकायतकर्ता के केस में समुचित कार्रवाई करने का निर्देश देगा. यही नहीं, पुलिस पीड़ित के आवास पर जाकर उसका बयान भी दर्ज कर सकता है.

5-किसी भी थाने में दर्ज हो सकते हैं FIR
सुप्रीम कोर्ट के आदेश मुताबिक बलात्कार जैसी गंभीर दुर्घटना की शिकार महिला किसी भी थाने में जीरो एफआईआर दर्ज करवा सकती है. सामान्यतः यह देखा जाता है कि इलाका और हल्के का हवाला देकर थाना इंचार्ज पीड़ित की प्राथमिकी दर्ज करने से मना कर देते हैं. किसी भी थाने जीरो FIR दर्ज होने के बाद उक्त थाने के सीनियर अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वह संबंधित इलाके के पुलिस थाने को कार्रवाई के लिए निर्देशित करे.

6-सुर्यास्त के बाद महिला की गिरफ्तार नहीं
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार एक महिला को सुर्यास्त के बाद और सुर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है. ऐसे बहुतों केस में देखे गए हैं जब महिलाओं को देर रात प्रताड़ित किया गया है. यही नहीं, रात में एक महिला की गिरफ्तारी महिला कांस्टेबल की मौजूदगी में भी नहीं हो सकती है. मसलन, महिला को सिर्फ दिन में ही गिरफ्तार किया जा सकता है.हालांकि गंभीर अपराध में संलिप्त महिला की गिरफ्तारी भी तभी संभव है जब पुलिस मजिस्ट्रेट द्वारा लिखित गिरफ्तारी के आदेश के प्रति प्रस्तुत करे, जिसमें यह बताना जरूरी है कि रात में महिला की गिरफ्तारी क्यों जरूरी है.

7-महिला को थाने पर नहीं बुला सकती है पुलिस
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 160 के तहत एक महिला को पूछताछ के लिए थाने पर नहीं बुलाया जा सकता है. यह कानून एक भारतीय महिला को थाने में फिजिकली पेश नहीं होने का अधिकार प्रदान करती है. हालांकि पुलिस महिला के आवास पर जाकर महिला कांस्टेबल, फेमली मेंबर व मित्र की मौजूदगी में पूछताछ जरूर कर सकती है.

8- पीड़ित की पहचान की रक्षा अनिवार्य है
आईपीसी की धारा 228ए के तहत बलात्कार पीड़ित महिला की पहचान उजागर करने को अपराध माना गया है. पीड़ित महिला का नाम और पहचान उजागर करने वाले किसी भी ऐसे कृत्य को अपराध की श्रेणी में रखा गया है. यानी किसी भी दशा में बलात्कार पीड़ित महिला की पहचान उजागर करना अपराध है, जो पुलिस और मीडिया दोनों पर लागू होता है. यहां तक की हाईकोर्ट अथवा लोअर कोर्ट में फैसलों के दौरान भी पीड़िता का नाम नहीं लिया जा सकता है.

9-डाक्टर को रेप की पुष्टि का अधिकार नहीं
सीपीसी की धारा 164ए के तहत प्रत्येक बलात्कार पीड़ित का मेडिकल जांच जरूरी है और केवल मेडिकल रिपोर्ट ही बलात्कार की पुष्टि के लिए जरूरी है. मसलन, अगर डाक्टर कहता है कि बलात्कार नहीं हुआ तो केस बंद नहीं हो सकता है. यही नहीं, मेडिकल रिपोर्ट की एक प्रति भी पीड़ित महिला को डाक्टर से लेने का अधिकार है. चूंकि बलात्कार एक लीगल टर्म है, जिसका मूल्यांकन एक मेडिकल अधिकारी नहीं कर सकता. मेडिकल अधिकारी सिर्फ पीड़ित के हालिया सेक्सुअल एक्टीविटी के मिले सुबूतों पर बयान दे सकता है कि बलात्कार हुआ या नहीं.

10- कार्यालयों में यौन उत्पीड़न कमेटी का गठन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाइडलाइन के मुताबिक यौन उत्पीड़न संबंधी वादों के निपटारे के लिए सभी निजी और सार्वजनिक कार्यालयों में यौन उत्पीड़न शिकायत कमेटी का गठन किया जाना जरूरी हो गया है और उसकी प्रमुख का महिला होना भी आवश्यक है.
-तथ्य स्रोत-क्रिमिनल प्रोसिजर कोड

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