महिलाओं को बस खरीदने के लिए बिना ब्याज का LOAN योजना

Friday, June 9, 2017

नई दिल्ली। ग्रामीण भारत में सार्वजनिक परिवहन में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार नई और अनोखी पहल करने जा रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण परिवार योजना में महिलाओं के स्व-सहायता समूह (SHGs) को शामिल करने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि यह योजना इस साल 15 अगस्त को शुरू होगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव अमरजीत सिन्हा ने कहा कि यह योजना पहले 250 ब्लाकों में लागू की जाएगी, जिसमें वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाके भी शामिल हैं। इसके तहत SHGs को बिना ब्याज के लोन मुहैया कराया जाएगा और इसकी महिला सदस्यों को 10 से 12 यात्रियों की क्षमता वाली मिनी बस चलाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

सिन्हा ने कहा कि अंततः इस योजना का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पूरे पांच लाख किलोमीटर की ग्रामीण सड़कों पर किसी न किसी तरह के सार्वजनिक परिवहन को चलाया जाए। देशभर में 32 लाख SHGs हैं, जिसमें करीब 3.8 करोड़ महिला सदस्य जुड़ी हैं। इनमें से कई महिलाएं इस योजना में शामिल होंगी और उन ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक परिवहन का संचालन करेंगी, जहां फिलहाल यह सुविधा उपलब्ध नहीं हैं।

सिन्हा ने कहा कि ग्रामीण स्वयं रोजगार प्रशिक्षण संस्थान 63 प्रशिक्षण केंद्रों पर ड्राइविंग कोर्स मुहैया कराते हैं और अब वे SHGs से जुड़ी महिलाओं को गाड़ी चलाना सिखाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि हम वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित और आदिवासी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जो दूरस्थ इलाकों में बसे हैं और जो कम आबादी वाले हैं।

यहां वर्तमान में बड़े पैमाने पर कोई सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं है क्योंकि यह वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। सिन्हा ने कहा कि 8 से 12 लाख रुपए में खरीदे गए 10-12 सीटर वाहनों का उपयोग स्थानीय लोगों के साथ-साथ पोल्ट्री और कृषि उत्पादों को परिवहन के लिए भी किया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हमारे पायलट अध्ययन से पता चला है कि न्यूनतम शुल्क वसूलने से बसों का संचालन करने वाले ब्याज-मुक्त ऋण चुकाने, ड्राइवर का भुगतान करने और अन्य रखरखाव के खर्च निकालने लायक पर्याप्त पैसे कमा सकते हैं। उन्होंने कहा कि परिवहन योजना प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) की पूरक होगी, जिसके तहत इस साल 150 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का रोज निर्माण करना है। वहीं, साल 2013-14 में प्रतिदिन 73 किलोमीटर प्रति दिन ही सड़कों का निर्माण होता था।

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