नाभकीय उर्जा में विस्तार के पहले जरूरी है

Tuesday, June 13, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। भारत सरकार नये परमाणु संयंत्र स्थापित करने पर गंभीर तरीके से सोच रही है। प्रधानमंत्री इस बारे मे विदेश मे कच्चा मॉल देने वालों से बातचीत भी कर चुके हैं। इसके विपरीत देश के वर्तमान परमाणु संयंत्रों के बारे में भी पड़ताल जरूरी है। गुजरात के काकरापार एटॉमिक पावर स्टेशन (केएपीएस) में परमाणु दुर्घटना को एक वर्ष का समय बीत चुका है और यह संयंत्र अब तक बंद पड़ा है। 11 मार्च 2016 को सुबह 9 बजे केएपीएस की यूनिट वन अचानक आपातकालीन स्थिति में स्वत: बंद हो गई। 

दरअसल इसके प्राइमरी हीट ट्रांसपोर्ट सिस्टम में पानी की जबरदस्त लीकेज हुई थी। परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद (एईआरबी) ने कहा कि इस रिएक्टर की सुरक्षा व्यवस्था जिसमें बैकअप कूलिंग सिस्टम शामिल था, वह एकदम ठीक ढंग से काम कर रही थी। आईएईए की इंटरनैशनल न्यूक्लियर ऐंड रेडियोलॉजिकल इवेंट स्केल पर इस घटना को पहले स्तर का आंका गया। इसे संयंत्र स्तर की खामी करार दिया गया।यह घटना अपने आप में एक अवसर है जिसकी मदद से हम  इस क्षेत्र  की नियामकीय प्रतिक्रिया की समीक्षा कर सकें। 

जापान ने फुकुशीमा दुर्घटना के बाद कुछ जरूरी कदम उठाये हैं, भारत में क्या आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय  हैं। बहरहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि क्या आम जनता को पता है कि ये सुरक्षा जांच किस प्रकार की जाती हैं? व्यक्तिगत स्तर पर और सामूहिक स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया की जांच करना आपातकालीन टीम को यह तय करने में मदद करता है कि किसी आपदा या दुर्घटना की स्थिति में बचाव का स्तर क्या होगा? साथ ही यह भी तय करने में मदद मिलती है कि बतौर अंशधारक वे सुरक्षा परिचालन में क्या मदद कर सकते हैं?

किसी भी संयंत्र में आपातकालीन परिस्थिति से तात्पर्य होता है घोषित रूप से रेडियो विकिरण का फैलना या उस संयंत्र के किसी खास हिस्से में कोई अन्य समस्या उत्पन्न होना। काकरापार में हुई दुर्घटना को संयंत्र स्तर की आपात घटना करार दिया गया था। एईआरबी द्वारा सन २०१४  में बनाई गई नाभिकीय विकिरण सुरक्षा नीति के अनुसार संयंत्र परिचालक यानी इस मामले में एनपीसीआईएल को आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए व्यापक योजना तैयार करनी चाहिए थी। उसने यह भी कहा कि संयंत्र को चलाने वाला संगठन ही वहां घटने वाली किसी भी तरह की घटना के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है।यह एक टालमटोल की प्रक्रिया है | 

ऐसे में यह संदेह तो है ही, काकरापार मामले में प्रेस विज्ञप्ति भर जारी करना ऐसे अहम मसले पर जनसंचार का सही तरीका है भी या नहीं। 

सुरक्षा निगरानी और जो कदम उठाए गए उनकी रिपोर्ट देशज भाषाओं में प्रकाशित होना चाहिए ऐसा करने से विश्वास और यकीन का माहौल बनेगा। अगर ऐसा होता है तो विभिन्न समुदाय ऐसी परियोजनाओं में गंभीर साझेदार माने जाएंगे। चूंकि हमारी योजना नाभिकीय ऊर्जा क्षमता में विस्तार करने की है इसलिए ऐसे कई सबक हैं जो संकट से निपटने के लिए जरूरी तौर पर सीखने होंगे।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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