FILM REVIEW: बेग़म जान देह का विज्ञान और भाषा समझाती है | BEGUM JAAN

Saturday, April 15, 2017

प्रवीण दुबे। विद्या बालन अभिनीत फ़िल्म बेग़म जान अच्छा पढने का शौक़ रखने वालों के लिए एक बेहद बेहतरीन फिल्म है। हालांकि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के लिहाज़ से "फास्ट एंड फ्युरियश- 8" इस फिल्म की 11 अभिनेत्रियों पर भारी पड़ रही है लेकिन बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तो उन फिल्मों का भी आ जाता है, जिनमें "सरकाए लो खटिया जाड़ा लगे" टाइप गाने होते हैं। इस फिल्म में भी खटिया है। जाड़े के बजाय बारिश है। आपस में गुत्थम-गुत्था नारी देह भी है लेकिन वो कामोत्तेजक नहीं लगती बल्कि झकझोरती है। सोचने पर बाध्य करती है कि देह क्षणिक सुख का माध्यम मात्र नहीं है बल्कि ये देह अनंत आनंद का साध्य भी हो सकती है।

देह का एक विज्ञान है...देह का संवाद है, विमर्श है...एक भाषा है और देह का आक्रोश भी है..जो मन के बजाय सिर्फ देह से प्रकट होता है। इस फिल्म में देह बिंदु से सिन्धु में समाने का ज़रिया बतौर प्रस्तुत की गई है...देह एक साज है जिसमें से मधुर स्वर लहरियां भी फूटती हैं और बेहद बेसुरा शोर भी.... इसमें देह उपभोग की चीज भी दिखाई गयी है और पूजा के योग्य भी... देह के माध्यम से समर्पण और देह के माध्यम से वितृष्णा को महसूस करना हो तो इस फिल्म से बेहतर नज़ीर कोई दूसरी नहीं हो सकती है।

बेगम जान बँगला फिल्म 'राजकहिनी' का हिंदी रीमेक है...फिल्म के 39 साल के डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी की हिंदी में ये पहली फिल्म है और मैं कहूंगा कि इसमें सारी "श्री" वो "जीत" कर ले गए। एक कोठे वाली की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म की केन्द्रीय भूमिका में बिद्या बालन हैं..कहानी आज़ादी के वक़्त देश के तकसीम होने के दौर की है। विद्या तो एक भरा-पूरा संस्थान हैं, लिहाज़ा उनके अभिनय और संवाद अदायगी की सराहना का जिक्र भी करना बेमानी ही है।

 थोड़े से नकारात्मक रंग में जिद्दी और क्रोधी तवायफ़ के किरदार को वो जी गई हैं। उनके कुछ साथी कलाकारों में गौहर खान, आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर ने भी अपने अभिनय से बहुत प्रभावित किया है...सबसे ज्यादा तारीफ़ फिल्म के निर्देशन और एडिटिंग की है..फिल्म का हर दृश्य बोलता हुआ सा, अपने आप में एक अर्थ समेटे हुए है....भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों की भूमिका में जब आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर आमने-सामने होते हैं तो पर्दे पर दोनों का जो आधा-आधा फ्रेम बनता है। 

वो विभाजन के दर्द और तनाव को बिना कुछ कहे कह देता है. फिल्म के एक दृश्य में बलात देह सुख पाने के लिए कामुक बलात्कारियों के सामने एक छोटी बच्ची और एक बुजुर्ग महिला का खुद को अनावृत कर देना हिलाकर रख देता है... सिर्फ मनोरंजन के लिए यदि आप फ़िल्में न देखते हों तो ज़रूर इस फिल्म को देखिए...फिल्म आपके मानस को ऑक्टोपस की तरह शनैः-शनैः जकड़ कर रखना शुरू करेगी और सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी कुछ घंटों तक आप इस जकड़न को महसूस करेंगे....अच्छा लगेगा देखिए एक बार...
लेखक प्रवीण दुबे ईटीवी मध्यप्रदेश के सीनियर एडिटर हैं। 

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