हिंदी सिनेमा और स्त्री विमर्श

Tuesday, April 11, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। जब देश में स्त्री सम्मान, स्त्री अस्मिता व स्त्री की ‘हां-ना’ पर नए सिरे से बहस छिड़ी हुई है। बहस का सिरा कभी साहित्य बन रहा है, कभी राजनीति, तो कभी सिनेमा। हमारी कुछ हिंदी फिल्में तो इधर स्त्री अस्मिता की बहस को नई दिशा देती दिखाई दी हैं। ये बहस की नई जमीन भी तैयार कर रही हैं। ये उस पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ मुखर होती दिखी हैं, जो अपनी सुविधा से स्त्री और पुरुष के अलग-अलग खांचे बनाती है। हिंदी सिनेमा में स्त्री का यह स्वर लंबे समय बाद मुखरित हुआ है। इस बार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार इन्हीं मुखर स्वरों का सम्मान है। पिंक और नीरजा जैसी सार्थक और सोद्देश्य फिल्मों को अलग से विशेष खांचे में डालकर देखना और पुरस्कार से नवाजना सिनेमा में स्त्री-विमर्श के दायरे को मजबूत करने वाले फिल्मकारों, स्त्री के हक की बात समझने वाले दर्शकों और स्त्री के खुद के संघर्ष की जीत है। यह उन फिल्मकारों, कलाकारों के साथ उस सोच का भी सम्मान है, जो ऐसी फिल्में बनाने का जोखिम लेना सिखाता है। यह हिंदी सिनेमा की उस धारा का भी सम्मान है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में चटक-मटक-मसालेदार फिल्मों से अलग कुछ नया देने की कोशिश की है। उसने परिपाटी और दर्शक की डिमांड के सनातन बहाने को भी नकारा है। वरना तो डिमांड के नाम पर वो ताबड़तोड़ हत्याएं दिखाता, बलात्कार करवाता और खलनायक को प्रतिष्ठित करता आया है। यानी वो सब कुछ परोसता तो अपनी मर्जी से है, लेकिन बड़ी चतुराई से उसे दर्शक की सोच के दायरे में धकेल देता है। खुद पैसे लूटता है और तोहमत हिंदी सिनेमा के दर्शक की समझ पर लगवाता है।

हिंदी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में सोच के स्तर पर बहुत कुछ नया दिया है। ऐसा कुछ, जिसे आप बस हिंदी सिनेमा के नाम पर खारिज नहीं कर सकते। इसने स्त्री-विमर्श सहित कई नए विषयों को तरजीह दी है। उन्हें सही परिप्रेक्ष्य दिया है, जिसकी जमीन कभी श्याम बेनेगल तैयार करते हैं, कभी केतन मेहता, कभी कल्पना लाजमी और कभी दीपा मेहता। मेघना गुलजार, लीना यादव, जोया अख्तर उसे आगे बढ़ाते हैं। इधर की पिंक, पॉर्च्ड, नीरजा व हाल में आई अनारकली ऑफ आरा ने भी ऐसे ही स्त्री-विमर्श को स्वर दिए। 

ये स्वर कभी मंडी, बाजार, भूमिका, माया मेमसाहब, फायर, फिजां, लज्जा व पिंजर जैसी फिल्मों से निकले थे, अब नया मुकाम हासिल कर रहे हैं। दंगल की बबिता के रूप में जायरा वसीम के पुरस्कार को भी इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए। पिंक को उसके विषय के कारण पुरस्कार मिलना सामाजिक विषयों पर साफ-सुथरी, उद्देश्यपरक फिल्म बनाने वालों को प्रोत्साहित करेगा।धनक जैसी बाल फिल्म का अलग रेखांकित होना और यतींद्र मिश्र की किताब लता सुर गाथा को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना भी स्वागतयोग्य है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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