UP में मुस्लिम महिलाओं ने दिलाई मोदी को प्रचंड विजय

Friday, March 17, 2017

नई दिल्‍ली। उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो चौंकाने वाले वोट मिले हैं वो किसी रैली या प्रचार का नतीजा नहीं है और ना ही विकास के नाम पर बंपर वोटिंग हुई है। यह जातिवाद भी नहीं है। पहली बार 10 लाख महिलाओं ने 'ट्रिपल तलाक' वाले मुद्दे पर अपने ही पति और पुरुषों के विरुद्ध वोटिंग की है। यह थोकबंद वोट भाजपा को मिला और इसी वोट ने सबको चौंका दिया। खुद भाजपाईयों को यकीन नहीं था कि जीत इस स्तर पर होगी। 

हर कोई आश्चर्यचकित था कि यूपी में भाजपा ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया फिर भी वो मुस्लिम बहुल इलाकों में जीतने में कामयाब रही। लोग अलग अलग कयास लगा रहे थे, लेकिन असली सच अब सामने आया है। मुस्लिम समुदाय की महिलाओं ने इस बार भाजपा के पक्ष में जमकर वोटिंग की है। 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरआरएम) ने तीन तलाक के विरोध में एक सिग्नेचर कैंपेन चलाया। जिसको देशभर से 10 लाख से ज्यादा लोगों का समर्थन मिला। इस मुद्दे पर समर्थन देने वालों मे ज्यादातर महिलाएं हैं। इस मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं का भाजपा को लगातार समर्थन मिल रहा है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मुद्दे का विरोध करता रहा है। आरएसएस के प्रमुख नेता और प्रचारक इंद्रेश कुमार ने इस मुद्दे पर राष्ट्रीयव्यापी चर्चा किए जाने और इसको खत्‍म करने की मांग की है। उनका कहना है कि तीन तलाक को खत्म करके मुस्लिम समाज में सुधार किया जाना च‍ाहिए। 

वहीं मुस्लिम राष्‍ट्रीय मंच (एमआरएम) के राष्ट्रीय समन्वयक मोहम्मद अफजल ने सिग्नेचर कैंपेन का समर्थन करते हुए कहा कि देश में बदलाव आ रहा है। महिलाएं अपनी आजादी के प्रति जागरुक हो रही हैं। सरकार ने उनकी दबी हुई आवाज को उठाया इसलिए समर्थन मिल रहा है।

उत्तर प्रदेश में जहां मुस्लिम आबादी 19.5 फीसद से अधिक है, वहां पर इसका झुकाव भाजपा की ओर होना काफी कुछ कहता है। यूं तो 120 विधानसभा क्षेत्रों में इस वर्ग के लोग हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, मगर 72 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी आबादी 30 फीसद से अधिक है। बावजूद इसके कहीं क्षेत्रीय समीकरण, कहीं पंथ को लेकर इस संप्रदाय में ऐसा मतभेद है कि वह सियासी रहनुमा चुनने में भी एकजुट नहीं हो पाते। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम के आंकड़ों से साफ है कि मुसलमानों के वोटों में जमकर बंटवारा हुआ। जिन 28 क्षेत्रों में उनकी आबादी 30 फीसद से भी ऊपर है, वहां भी भाजपा का 'कमल' खिल गया। 

मुस्लिम बहुल अलीगढ़ में सपा व बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को हासिल मतों का जोड़ भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से भी दस हजार ज्यादा होता है। इलाहाबाद दक्षिण में यह जोड़ भाजपा के जीते प्रत्याशी से 16 हजार अधिक है। बहेड़ी में बसपा प्रत्याशी को 66009 और सपा को 63841 मत मिले। यानी भाजपा प्रत्याशी से 22 हजार अधिक।

बांगरमऊ में सपा को 59330, बसपा को 44730 मत मिले जबकि भाजपा के विजयी प्रत्याशी को 87657 मत मिले। सपा-बसपा के मतों को जोड़ दिया जाए तो वह भाजपा प्रत्याशी के मतों से 17 हजार अधिक है। बड़ापुर में कांग्रेस को 68920, बसपा को 50684 मत मिले। इनका योग भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से 40 हजार से अधिक है। इसी तरह चायल, तुलसीपुर और नानपारा में मतों के विभाजन में भाजपा को जीत मिली।

भोजीपुरा में सपा को 72617 व बसपा 49882 मिले जो भाजपा के विजयी प्रत्याशी से 22 हजार अधिक है। इसी तरह सपा-बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों का जोड़ चायल में चार हजार, देवबंद में 26 हजार, कांठ में 41 हजार और मेरठ दक्षिण में 34 हजार अधिक है। ये सभी क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं।

मुस्लिम राजनीति का लंबे समय से अध्ययन कर रहे अभय कुमार कहते हैं कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव व 2017 के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि मुसलमान मत एकजुट नहीं होता है। उसमें कतिपय कारणों से सीधा बंटवारा होता है। गैर भाजपा दलों को इन परिणामों की रोशनी में आगे की रणनीति तैयार करनी होगी।

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