JAMSHEDJI TATA बर्थडे स्पेशल: गुलाम भारत में कर्मचारियों को दी आजादी

Thursday, March 2, 2017

जमशेदजी नसरवानजी टाटा को भारतीय उद्योग का पिता कहा जाता है। उन्होंने पहली भारतीय कंपनी की स्थापना की जिसको बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनको "आधुनिक भारत के बड़े संस्थापकों में से एक" बताया था।

जमशेदजी टाटा ने जो पौधा बम्बई, जो अब मुंबई हो गया है, में साल 1868 में लगाया था, अब टाटा समूह में बदल गया है, जो एक वैश्विक संगठन हो चुका है, जिस में 100 से अधिक कंपनियां शामिल हैं जो 100 से अधिक देशों में कार्यरत हैं। साल 2013-14 में इन कंपनियों का कुल कारोबार 103 अरब डालर से अधिक था। अगर एक डॉलर की कीमत 65 रुपये मान ली जाए तो यह राशि 6 लाख 71 हजार करोड़ के पास पहुंचती है। इस कारोबार का 67.2 प्रतिशत भारत के बाहर से आता है। यह समूह दुनिया भर में 581,470 से अधिक लोगों को रोजगार देता है। टाटा संस, टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है जो मुंबई में स्थित है। टाटा संस के शेयरों के दो तिहाई शेयर परोपकारी ट्रस्टों के पास हैं। इन ट्रस्टों ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा अनुसंधान, सामाजिक अध्ययन और कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्व के कई संस्थानों की स्थापना की है। 

पुजारी परिवार से थे जमशेदजी टाटा 
जमशेदजी नसरवानजी टाटा 03 मार्च 1839 को दक्षिण गुजरात में एक छोटे से शहर नवसारी में नसरवानजी टाटा और जीवनबाई के घर पैदा हुए थे। यह शहर उस समय बड़ौदा रियासत का हिस्सा था। जमशेदजी टाटा के पिता, नसरवानजी टाटा, पारसी पुजारियों के एक परिवार से सम्बंध रखते थे। यह परिवार 25 पीढ़ियों से पुजारियों का काम कर रहा था लेकिन उन्होंने व्यापार करने का निर्णय किया और वह बम्बई चले गए। उन्होंने एक छोटे व्यापारी के रूप में काम शुरू किया और सफल हुए।

21000 रुपए पूंजी से शुरू किया कारोबार 
साल 1852 में जब जमशेदजी की आयु केवल 13 साल थी तो उन के पिता ने उन को बम्बई बुला कर एक स्थानीय स्कूल में दाखिल करा दिया। साल 1855 में जब जमशेदजी टाटा की आयु 16 वर्ष थी तो उन की शादी दस वर्षीय हीराबाई डाबू से कर दी गई जो कुरसेतजी डाबू की बेटी थीं। जमशेदजी 1858 में स्नातक होने के बाद अपने पिता के कारोबार में शामिल हो गए।जमशेदजी टाटा ने अपने पिता के व्यवसाय में 29 साल की आयु तक काम किया और फिर वर्ष 1868 में 21,000 रुपये की पूंजी के साथ एक ट्रेडिंग कंपनी की स्थापना की।

भारत में पहली स्वदेशी कंपनी शुरू की 
साल 1874 में उन्होंने सैन्ट्रल इण्डिया स्पिनिंग, वीविगं एण्ड मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी नाम की एक कंपनी बनाई। यह एक भारतीय द्वारा शुरू की गई पहली कंपनी थी जिस के शेयरों का बम्बई स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार होता था। इस कंपनी की पूंजी पांच लाख रुपये थी, जबकि टाटा ने इस में एक लाख पचास हज़ार रुपए का निवेश किया था। टाटा, कंपनी के प्रबंध निदेशक बने। उन्होंने इस कंपनी के बैनर तले एक कपास मिल लगाने का फैसला किया और इस उद्देश्य के लिए नागपुर को चुना।

37 साल की उम्र में कपड़ा मिल लगाई 
इस मिल का उद्घाटन पहली जनवरी 1877 को किया गया। उसी दिन महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया था। टाटा ने अपने मिल का नाम ऐम्परैस मिल रखा। जब टाटा ने इस मिल की स्थापना की तो उन की आयु केवल 37 वर्ष थी। ऐम्परैस मिल जल्द ही भारत में सबसे प्रमुख कपड़ा मिल बन गया। टाटा ने कई और टेक्सटाइल मिल्स भी स्थापित किए जिनमें से कई को उन्होंने लाभ के साथ बेच दिया। 

कर्मचारियों का खयाल रखते थे 
उनकी मिलें अपने उत्पादों की गुणवत्ता के लिए जानी जाती थीं और वह दुनिया भर में सबसे अच्छी तरह संचालित मिलें थीं। उन मिलों में कई ऐसी नीतियां अपनाई गईं जो अपने समय से दशकों आगे थीं। मिसाल के तौर पर इन मिलों ने अपने वर्करों के प्रशिक्षण का प्रबंध किया। उन को पेंशन की सुविधा दी। वरकरों को अच्छा काम करने पर इनाम भी दिया जाता था। उनको चिकित्सा सुविधा, दुर्घटना क्षतिपूर्ति और महिला कर्मचारियों के बच्चों की देखभाल की सुविधाएं भी दी जाती थीं।

जमशेदजी के 3 अधूरे सपने 
जमशेदजी टाटा ने जीवन भर चार परियोजनाओं को पूरा करने का सपना देखा – देश में इस्पात का उत्पादन, पनबिजली का उत्पादन, एक विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना और मुंबई में एक होटल की स्थापना। उनके जीवनकाल में केवल होटल परियोजना ही पूरी की जा सकी। टाटा न्यूयॉर्क से चार्ल्स पेज पेरिन को भारत लाए। पेरिन एक भूविज्ञानी होने के साथ ही एक धातुशोधक भी थे। पेरिन ने 1903 में बिहार के सक्ची गांव में जो अब झारखंड राज्य का एक हिस्सा है, सर्वेक्षण शुरू किया। पेरिन और उनकी टीम ने उस जगह लगभग तीन अरब टन लौह अयस्क भंडार का पता लगाया। इधर तो यह खोज की गई, और उधर जर्मनी में जमशेदजी टाटा का निधन हो गया। 

बेटों ने पूरी की परियोजनाएं 
जमशेदजी टाटा के पुत्रों, दोराबजी टाटा और रतन टाटा, ने उनकी मृत्यु के बाद इस परियोजना को पूरा किया। 'टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी' (टिस्को) 1907 में अस्तित्व में आई। बाद में इस का नाम टाटा स्टील हो गया। टाटा का दूसरा ड्रीम प्रोजेक्ट बम्बई शहर को स्वच्छ और प्रदूषण रहित ऊर्जा प्रदान करना था। उस समय बंबई शहर का दम कपड़ा मिलों के बॉयलरों के धुएं से घुट रहा था लेकिन बिजली परियोजना भी उनके जीवनकाल में पूरी नहीं हो सकी। 
उनके पुत्रों, दोराबजी टाटा और रतन टाटा, ने तीन पनबिजली कंपनियों की स्थापना की: टाटा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर सप्लाई कंपनी, आंध्र वैली पावर सप्लाई कंपनी और टाटा पावर कंपनी। अन्य दो कंपनियों का वर्ष 2000 में टाटा पावर कंपनी में विलय कर दिया गया। मई 2015 में भारत में टाटा पावर की स्थापित उत्पादन क्षमता 8747 मेगावाट थी।

भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना 
जमशेदजी टाटा का तीसरा सपना भारत में एक उच्च-स्तरीय विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना करना था। अक्टूबर 1898 में उन्होंने बम्बई में अपनी 14 बिलडिंगें और 4 ज़मीनें विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दे दीं। ब्रिटिश सरकार ने काफी प्रयास के बाद विश्वविद्यालय के लिए अनुमति दी। वायसराय लॉर्ड मिंटो ने 27 मई 1909 को भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के गठन की अनुमति दी। मैसूर के महाराजा ने विश्वविद्यालय की इमारत के निर्माण के लिए बैंगलोर में 372 एकड़ जमीन दी। उन्होंने इमारत के निर्माण के लिए पांच लाख रुपए नकद दिए और विश्वविद्यालय को हर साल पचास हजार रुपए देने का वादा किया। भारतीय विज्ञान संस्थान ने 24 जुलाई 1911 से काम शुरू कर दिया।

मुंबई में वर्ल्ड क्लास होटल 
जमशेदजी टाटा पूरी दुनिया में घूम फिर चुके थे। वह यूरोप और अमेरिका की राजधानियों में सबसे अच्छे होटलों में ठहरा करते थे। वह चाहते थे कि मुंबई में भी उन्हीं स्तरों का एक होटल होना चाहिए लेकिन ताज महल पैलेस होटल की स्थापना के कारण के बारे में कई कहानियां प्रसिद्ध हैं। एक कहानी के अनुसार, टाटा एक बार अपने एक विदेशी मेहमान को एक होटल में दोपहर का भोजन कराने के लिए अपने साथ ले गए। उन को भारतीय होने के कारण उस होटल में प्रवेश नहीं करने दिया गया। होटल के निर्माण पर कुल खर्च ढाई लाख पाउंड और उस को सुसज्जित करने पर पांच लाख पौंड का खर्च आया। होटल का उद्घाटन 16 दिसम्बर 1903 को किया गया। 

सादा जीवन बिताते थे टाटा, कभी शराब नहीं पी
टाटा बहुत धन होने बावजूद बहुत सादे इंसान थे। मुंबई में उनका घर, एस्प्लेनेड हाउस, उनके दूर के रिश्तेदारों सहित परिवार के सभी सदस्यों के लिए हमेशा खुला रहता था। वह बच्चों के साथ नरमी का बरताव करते थे लेकिन उन्होंने बच्चों को समय या पैसा बर्बाद करने की अनुमति कभी नहीं दी। वह हुमाता अर्थात अच्छे विचार, हुखता अर्थात अच्छे शब्द और हुवार्शता अर्थात अच्छे कर्मों के पारसी सिद्धांतों में विश्वास करते थे। उन्होंने अपने नीले रंग के प्रतीक चिन्ह पर इन विचारों को लिखवा रखा था। धन होने और उच्च समाज से मेल जोल होने के बावजूद उन्होंने कभी शराब या अन्य मादक पेयों का सेवन नहीं किया।

समाजसेवा का ढोंग नहीं, मजबूत योजना 
जमशेदजी सब लोगों को इंसान समझते थे और सब की परवाह करते थे। उन्होंने अपने पूरे धन को तीन बराबर भागों में बांटा। एक हिस्सा अपने दोनों बेटों को दिया, दूसरा हिस्सा विश्वविद्यालय परियोजना के लिए दिया और शेष तीसरा हिस्सा अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, परिचितों और सेवकों को दिया। वह किसी को भी नहीं भूले। उन्होंने अपने तमाम मौजूदा और पुराने कर्मचारियों को हर एक साल या उस के भाग की नौकरी के लिए एक महीने का वेतन दिया। उन्होंने 1892 में 25 लाख रुपये से 'जेएन टाटा ट्रस्ट ' की स्थापना की। उस समय यह एक बड़ी रकम थी। इस ट्रस्ट ने पात्र भारतीयों को विशेष रूप से इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की।वर्ष 1924 आते आते स्थिति यह हो गई कि भारतीय सिविल सेवा, अर्थात आई.सी.एस. जो अब आई.ए.एस. कहलाता है, के लिए चुने जाने वाले हर पांच भारतीयों में से दो भारतीयों ने टाटा ट्रस्ट से छात्रवृत्ति ली हुई होती थी। 

स्वदेशी के विचार से पहले स्वेदशी मिल स्थापित की 
जमशेदजी टाटा ने अपने कर्मचारियों को अधिक से अधिक सुविधाएं प्रदान कीं। उन्होंने काम के घंटे कम किए, कार्यस्थलों को हवादार बनाया, भविष्य निधि और ग्रेच्युटी योजना शुरू की। उन्होंने कर्मचारियों को दुर्घटना और बीमारी लाभ देना शुरू किया। कर्मचारियों को छुट्टियों का भुगतान किया और सेवानिवृत्ति पेंशन दी। यह सारी सुविधाएं उस समय पश्चिम के देशों में भी नहीं दी जा रहीं थीं। जमशेदजी 1885 में कांग्रेस पार्टी के स्थापना समारोह में उपस्थित थे। उन्होंने हमेशा कांग्रेस का समर्थन किया और वह अपने जीवन के अंत तक इस पार्टी के सदस्य रहे। देश में स्वदेशी शब्द प्रचलित होने से बहुत पहले, उन्होंने अपनी मिलों में से एक मिल का नाम स्वदेशी मिल रखा था।

जमशेदजी टाटा का निधन 
जमशेदजी टाटा एक व्यापार यात्रा पर जर्मनी गए हुए थे। वह वहां गंभीर रूप से बीमार हो गए और उनका वहीं 19 मई 1904 को निधन हो गया और वह अपनी कई परियोजनाओं को अधूरा छोड़कर इस दुनिया से चले गए। उनके पुत्रों ने उन परियोजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया।
जमशेदजी टाटा को इंग्लैंड में वोकिंग में ब्रूकवुड पारसी कब्रिस्तान में दफनाया गया। 
प्रस्तुति: ग्लोबल रिकॉर्डर नीव्ज़ एण्ड फीचर्स 

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