श्रीश्री रविशंकर ने शिवराज सिंह को आदि शंकराचार्य के समान संत बताया

Tuesday, February 28, 2017

अधिराज अवस्थी/भोपाल। मप्र की राजधानी भोपाल के दशहरा मैदान में आर्ट आॅफ लिविंग द्वारा आयोजित फागोत्सव में आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ के रंग में इस कदर रंगते चले गए कि उन्होंने सीएम शिवराज सिंह को आदि शंकराचार्य के समान संत पुरुष निरूपति कर दिया। 

उन्होंने श्री चौहान की लोकहितकारी कार्य-शैली की तारीफ करते हुए कहा कि नर्मदा सेवा यात्रा अत्यंत प्रशंसनीय पहल है। आदि शंकराचार्य को नर्मदा के किनारे गुरु मिले थे। समाज को सहेजने का जैसा काम आदि शंकराचार्य ने वर्षों पहले किया था वैसा ही शिवराज जी आधुनिक समय में कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिवराजजी राजनीति में रहते हुए संतों के काम कर रहे है। 

कौन हैं आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया और भारत में चार कोनों पर चार मठों की स्थापना की। भारत में परमकल्याणकारी मानी जाने वाली चारधाम यात्रा आदि शंकराचार्य ने ही प्रारंभ कराई थी। 

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् 788 को तथा मोक्ष ई. सन् 820 स्वीकार किया जाता है। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। 

आद्य शंकराचार्य के चमत्कार 
कुछ उनके जीवन के चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे। आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना। पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना। सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना। सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना। दरभंगा में जाकर मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना। भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना। इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है। चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त किया। 

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