नोटबंदी पर मोदी से अपील: कड़वी दवाई खिलाते रहें परंतु गुड़ में रखकर

Saturday, November 19, 2016

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मित्रो प्रणाम
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं तो इस घरेलू धन को बाहर निकालने के प्रयाशों के नाम पर की गयी " नोट बंदी " के भी होंगे , और होना भी चाहिए क्यों की जिस सिक्के के दो पहलू नहीं होते वह सिक्का खोटा माना जाता है ।
इसे किसी पार्टी के निर्णय से न देखें , मैं भी  अर्थशास्त्री नहीं हूँ परंतु मैंने जितना समझा है इस विज्ञान को , उसके अनुसार इस का सकारात्मक पहलू यह है कि अब सरकार के इस फैसले से देश का 95 प्रतिशत पैसा बैंकों में आ जायेगा जिससे हमारे बैंक अधिक क्षमतावान हो जायेंगे ।

योजनाओं के लिए लोन सहज उपलब्ध होने लगेगा , विकास को गति मिलेगी , और भी कई फायदे होंगे ।
टैक्स बढ़ेगा जिससे सरकार की कार्य क्षमता बढ़ेगी । टैक्स चोरी बहुत नियंत्रित होगी , भृष्टाचार भी उतना ही होगा जो पाचन योग्य हो ।कई पीढ़ियों की चिंता करना अब धनपशु कम कर देंगे । प्रायोजित आतंकवाद , हवाला , नकली नोट पर नियंत्रण तो इस निर्णय की सर्वाधिक बड़ी सफलता है । इसके लिए सरकार का अभिनन्दन होना चाहिए ।

लेकिन इस निर्णय के  नकारात्मक पहलू पर विचार करेंगे तो अब हमें अधिक सावधानी रखनी होगी  क्यों की मंदी  का असर अब  भारत में वैसा भयावह दिखेगा जैसा पूरे विश्व में दिखाई देता है । क्यों की हमारी अर्थ व्यवस्था अभी एक विशिष्टता लिए हुए थी  क्यों की हमारी अर्थव्यवस्था पूर्णतः बाजार पर निर्भर नहीं थी बल्कि परिवार पर निर्भर थी , हमारा बहुत सारा लेनदेन और संचय नकद में होता था , खासकर हमारे देश की महिलाएं  परंपरागत रूप से संचयी प्रवत्ति की होती हैं । जिसका उल्लेख दुनिया के अर्थशास्त्री उस समय कर चुके हैं जब वो इस बात का अध्ययन करने भारत आये थे की भारत में वैश्विक मंदी का असर क्यों नहीं हो रहा है।

 इसके अतिरिक्त इस निर्णय का एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि इतने अधिक सरकारी नियंत्रण और जांच से  अर्थ व्यवस्था में धन का बहाव थम गया है , लोग सिर्फ अत्यधिक जरुरत पर खर्च कर रहे हैं जिससे छोटे व्यापारी   बहुत परेशान है , उनका प्रतिदिन के व्यापार में 80 प्रतिशत की गिरावट है जो एक खतरनाक संकेत है। 

सरकार को जनता के हाँथ में पैसा रहे और पैसा अर्थव्यवस्था में चक्रित होता रहे इसके लिए भी प्रयाश करने होंगे । सम्पूर्ण पैसा सरकार की तिजोरी में जमा हो जाना भी आदर्श अर्थव्यवस्था नहीं है इसके लिए तो जनता के पास पैसा पहुंचना चाहिए ।

तीसरी  सबसे बड़ी शंका यह है कि यदि इस अचानक हुई धन आवक का उपयोग यदि उद्योगपतियों के मिथ्या लोन अर्थार्त  यह सोच कर लिए गए लोन की झूठी बैलेंस शीट दिखाकर सरकार से लोन माफ़ करवा लेंगे , यदि माफ़ किये गए तो यह जनता के साथ शताब्दी का सबसे बड़ा छल होगा  । यदि किसी उद्योग घराने को किसी प्रोजेक्ट में हानि हुई है तो उसकी बसूली दूसरे मुनाफे बाले प्रोजेक्ट से  होना चाहिए । मूल धन पर तो किसी भी प्रकार की छूट जनता के पैसे का अपव्यय नहीं है लूट है जो नहीं होना चाहिए ।

चिंता इस बात की भी है कि क्या भविष्य में भी हमारे सभी प्रधानमंत्री इतने राष्ट्रनिष्ठ होंगे की हम अपना 100 प्रतिशत धन उनके हवाले कर पाएंगे । यदि भविष्य में यह देश किसी कारण गलत हांथों में चला गया  तो याद रखना इसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे और  इसका दोष  सभी राजनैतिक दल मिलकर  मोदी जी के इस निर्णय को देंगे , जिसकी वो अभी से प्रस्तावना लिख रहे हैं ।

राजनीति में इतना बड़ा और संवेदनशील  फैसला लेना निश्चित रूप से सरकार की और जनता की परीक्षा होती है  , फिर मोदी जी तो जन अपेक्षाओं के पहाड़ के समक्ष खड़े हैं जहाँ उन्हें देश का काला धन भी बाहर है और विदेशों में जमा धन को भी भारत में लाना है , गौ हत्या पूर्णतः प्रतिबंधित  एवं धारा 370 को भी समाप्त करना है । दलित वर्ग के विकास पर भी  कार्य करना है एवं जातिगत आरक्षण के कारण लगातार अवसाद और  निराशा से घिर रहे सामान्य वर्ग के युवाओं के साथ भी न्याय करना है , आधुनिक विकास भी करना है एवं संस्कृति एवं प्रकृति भी बचाना है अतः ऐसे समय में जनता की भूमिका भी बढ़ जाती है की वह अपने शासक को कमजोर न होने दे ,  और शासक का दायित्व भी बढ़ जाता है कि वह जनता के धैर्य और समर्पण का मान रखे

मैं मोदी जी का समर्थक हूँ , और सदैव रहूँगा । मुझे लगता है कि उन जैसे राष्ट्रभक्त व्यक्ति पर संदेह करना अपराध है , परंतु हमें इतना भी ध्यान रखना होगा की भारत की अर्थव्यवस्था कहीं भारतीय धन पशुओं से निकलकर , वैश्विक धनपशुओं के पास न चली जाए । कहीं हमारा छोटा दुकानदार , व्यापारी , हितग्राही इस आर्थिक नियंत्रण की चपेट में दम न तोड़ दे । इसलिए हमारी सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा की अर्थव्यवस्था निगरानी में तो हो परन्तु आंशिक उदार भी रहे । कहीं ऐसा न हो की इस घरेलू काले / संचित धन से देश में बुलेट ट्रेन तो चल जाये परंतु उस में सफर करने बाले देशवासी न रहें ।

यह सरकार जनता का सर्वाधिक विश्वास लेकर आई है अतः सरकार की हर अपील का जनता पर व्यापक असर देखने को मिलता है वो चाहे गैस सब्सिडी छोड़ने में हो अथवा झाड़ू उठाकर स्वच्छता अभियान में हो अथवा कर वृद्धि में हो या स्वच्छता कर अतिरिक्त लगाने पर हो या अभी अभी की गयी नोटबन्दी को लेकर हो । जनता सरकार के हर कदम पर साथ खड़ी दिखाई दे रही है ।

लेकिन अब इस नोट बंदी के बाद सरकार को जनता को व्यापक स्तर पर राहत देने के उपाय करने चाहिए  । यदि सरकार के दावा सही है कि उसे कोयला खदानों की नीलामी में कई गुना फायदा हुआ है , स्पेक्ट्रम की नीलामी से खजाने में वृद्धि हुई है , भृष्टाचार रुकने से सरकार समृद्ध हुई है और नोट बंदी और आय घोषणा योजना से उसके पास काला धन आया है तो फिर अब आधा कार्यकाल बीतने के बाद सही समय है कि जनता को अब उसका प्रत्यक्ष लाभ अनुभव होना चाहिए ।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अभी हमारा टैक्स सिस्टम बहुत कठिन भी है और ज्यादा भी , अतः उसका सरलीकरण और सहजीकरण दोनों होना चाहिए । हर आदमी अपना पैसा अपने पास रखे एवं उसका टैक्स सरकार को दे इसके लिए लेने बाले और देने बाले दोनों को उदार होना पड़ेगा । टैक्स देने बाले को सरकार कुछ लुभावनी योजनाओं से भी प्रेरित कर सकती है जैसे उसका निजी बीमा/ स्वास्थ्य बीमा /समान  एवं निशुल्क शिक्षा/ वृद्धावस्था पेंशन /बच्चों की शादी बाले वर्ष में कर छूट ) जैसा की अधिक टैक्स लेने बाले देशों में होता है वहां की सरकार टैक्स तो 40 प्रतिशत तक लेती है परंतु बदले में उपरोक्त सुविधाएँ देकर वह अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित जीवन प्रदान करती है ।

हमें भारतीय जन मानस की यह बात समझनी होगी की वह नियम विरुद्ध धन संचय अथवा कर चोरी अपने बच्चों की पढाई / आकस्मिक स्वास्थ्य / शादी / बुढ़ापा के लिए करता है । उसका मन यह नहीं मानता की वह कर चोरी कर रहा है वह इसे कर बचत के रूप में देखता है । यदि सरका देश में उपरोक्त सुविधाएँ करदे तो मुझे लगता है भारतीय भी टैक्स देने में आगे आकर देश के विकास में सहभागिता करेंगे और निश्चिन्त जीवन जी सकेंगे । यह सरकार को सुझाव और निवेदन मात्र है हो सकता है कि मोदी जी ने इससे भी अच्छा कुछ सोचा हो । परंतु हम उसके लिए अभी प्रतीक्षरत हैं ।

*इस कठिन समय में जब देश इस आशा के साथ कतार में खड़ा है कि हमारा देश दुनिया की कतार में आगे आ जाये तो ऐसे में सभी की भूमिका बढ़ जाती है*
समाज सेवियों की भूमिका भी बड़ी है कि वह अपने आस - पास धन को सफ़ेद करने का काला कारोबार न होने दें , क्यों की 500 का नोट 400 में चलने के धंधे तुरंत प्रारम्भ हो गए हैं जो दुखद है ।अगर ऐसा हुआ तो इतना बडा निर्णय , जनता का परिश्रम , बैंक कर्मियों की तपस्या सब कुछ व्यर्थ रह जायेगा ।

2000 का नोट तात्कालिक रूप से ठीक हो सकता है परंतु  लंबे समय तक उसकी उपयोगिता फिर समस्या खड़ी करेगी । अतः सरकार को अब ई- लेनदेन / मोबाइल बैंकिंग / upi / चैक इत्यादि प्रयोग करने के लिए भारतीय जनता को प्रशिक्षित करने एवं आय - व्यय का हिसाब  हेतु शाखा स्तर पर ट्रेनिंग कैंप आयोजित करना चाहिए क्यों की चतुर लोग अपने पैसे को भोले भाले लोगों के खाते में डालकर उन्हें कानूनी फंदे में फ़साने का काम कर रहे हैं ।

अतः सरकार से निवेदन है कि 
1. कड़वी दवाई खिलाते रहें परंतु गुड़ में रखकर
क्यों की मोदी जी को कुर्सी से मोह / जरुरत हो न हो पर हमें और देश को मोदी जी की जरुरत लंबे समय तक है ।
2. देश की जनता को ई - भुगतान हेतु प्रशिक्षित करें एवं टैक्स या तो कम करें अथवा टैक्स के साथ सुविधाएँ बढ़ाएं ।

एवं देश की जनता से अपील
1 . यह फैसले हमारे बच्चों की खुशहाली के लिए है अतः धैर्य रखें अपने से गरीब आदमी को सहयोग करें ।
2 . फिजूल खर्ची न करें 
3 . यदि आपके पास नोट हैं तो ठिकाने लगाने की बजाय अपने खाते में जमा करें और उसके कर का भुगतान करें ।
4. अधिक से अधिक भुगतान ई पेमेंट के माध्यम से करें ।

नेता समाज के चाकर है और कवि समाज के चारण
अतः जनभावनाओं का सम्मान और उन्हें यथा व्यक्ति तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य है परंतु कुछ लोग राजनीति में चमचागिरी कर और जनता पर कुतर्क थोपते हैं और कुछ सुनना ही नहीं चाहते । कई बार तो ऐसे लोग जन भावनाओं को समझे बिना इतना कुतर्क और उपदेश जनता को सुनाते हैं कि जनता खींज जाती है और उसके परिणाम एक अच्छी सरकार को  भुगतने पडते हैं ।

याद रहे पूज्य अटल जी की सरकार ने विदेशी कर्ज / परमाणु परीक्षण एवं सड़क पर ऐतिहासिक कार्य किया था लेकिन इसी  जनता ने थोड़ी सी मंहगाई बढ़ने पर इतनी अच्छी सरकार को बदलकर ऐसे लोगों को सौंप दी थी जिनका कुशासन जनता जानती थी । एक किसान जिसका बेटा फ़ौज में है और जो कड़ी धूप में मेहनत करके देश का पेट भरता है वो देश सेवा का भाषण  ac में बैठकर whatsapp चलाने बाले "वाक बहादुर " से तो नहीं सुनना चाहेगा ।

अतः  वाकबहादुरों से  निवेदन  ----  अनावश्यक उपदेश देकर जनता को सरकार के प्रति कटु न करें , भरे पेट उपवास पर प्रवचन नहीं दिए जाते ।

आपका

कवि सुमित ओरछा 
(वक्ता एवं मंचसंचालक )
प्रदेश अध्यक्ष - राष्ट्रीय कवि संगम म प्र
संयोजक - आजाद बलिदान महोत्सव ओरछा
संपर्क - 9424922056, 9981401181
ईमेल - kavisumitorc@gmail.com
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