नोट बंदी: जरा अपने गिरेबां में भी झांको, राजनीतिक दलों !

Friday, November 11, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। पूरे देश में नोट बंदी ने हाहाकार मचा दिया है। बेगूसराय रेप पीडिता बेटी को लेकर बाप पटना जाने के लिए रोता रहा कोई उसके 500 के नोट को सौ में भी लेने को तैयार नहीं था। भोपाल का बंसल अस्पताल निजी होने के कारण सिर्फ कार्ड पेमेंट मांग रहा था। इंदौर में विदेशी अतिथियों को चाय नाश्ता तक दुर्लभ हो गया था। सारे पेट्रोल पम्पों पर लूट मची थी। मैं भी चार घंटे लाइन में लग कर सब्जी दूध और ब्रेड खरीदने के लिए एक बैंक से बमुश्किल चार हजार रूपये बदलवा सका। 

कालाधन निकलवाने की इस मुहिम ने कई घटनाये देश में घटित की है। श्रेय लेने को बहुत से लोग घूम रहे है, पर इस मुहिम से निकली [बेगुसराय और अन्य कई घटनाएं] कालिख किस चेहरे पर पोते ? एक प्रश्न है। सारा मसला अघोषित आय का है। नागरिकों से सवाल करने वालों राजनीतिक दलों जरा ये तो बताओ  तुम पैसे कहाँ से लाते हो और आय कर तो दूर अपने आलीशान दफ्तरों तक का किराया तक नहीं देते हो।

देश के एक पूर्व सूचना आयुक्त श्री सत्यानन्द मिश्र को सेल्यूट करता हूँ, जिसने पहली बार राजनीतिक दलों की आय और भवन के मामले में निर्णय दिया था। आज मोदी की आलोचना करने वाले और मोदीजी की पार्टी खुद सर्वोच्च न्यायलय से इस मामले में स्थगन आदेश ले आये थे। दिल्ली और प्रदेशों में सारे राजनीतिक दलों ने 5 सितारा होटल को भी मात करते कार्यालय खोल रखे है। जिन सरकारी बंगलो में तोड़फोड़ कर ये नमूने खड़े किये गये है या तो उनका किराया नहीं दिया जाता है , या यह जमीन कौड़ियों के भाव हथिया रखी है। जबकि देश में फुटपाथ पर एक रात गुजारने  वालों को पुलिस डंडे मारती है।

काले धन के पक्ष में यह मेरी दलील नहीं है। मेरी गुजारिश इस मुहीम के पक्ष विपक्ष में खड़े लोगो से अपने गिरेबां में झाकने की है। काले धन से ज्यादा जरूरी काले मन से मुक्ति है। आप किसी भी नागरिक से तभी इस मुहीम को सफल बनाने की उम्मीद कर  सकते हैं, जब आपके हाथ साफ़ हो। राजनीतिक दलों में तो इस विषय को लेकर इतनी कालिख है कि उसे छूने वाली हवा तक काली और जहरीली हो गई है।

देश में किसी भी चुनाव से पहले अपने गिरेबान में, इस मुहिम के पश विपक्ष में खड़े राजनीतिक दलों की झांक लेना चाहिए कि क्या उनने टिकट तो नहीं बेचा है ?उनका कितनी सरकारी जमीन और बंगले पर कब्जा है ? उनने खुद किराया कितने दिन से नहीं दिया है ? उनके किस धनपशु के साथ अन्तरंग रिश्ते हैं ? 500 और हजार के नोट का हिसाब देना हर नागरिक का कर्तब्य है पर हिसाब मांगने वाले आप भी तो अपने कृष्ण मुख को उज्ज्वल करके आयें।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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