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अरे, भाई ! संसद तो चलने दो

Saturday, November 26, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। संसद की वर्तमान दशा देखकर हर विवेकशील भारतीय दुखी है। संसद विमर्श के लिए है, बहस के लिए है। निर्णय करने के लिए है लेकिन गतिरोध के लिए बिलकुल नहीं। जिस सदन के हाथों देश की नियति निर्धारण का महत्त्वपूर्ण दायित्व है, वह दायित्व निभाने की जगह हंगामे की भेंट चढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नोट वापसी के फैसले से विपक्ष का सहमत या असहमत होना स्वाभाविक है। कोई नहीं कहता कि आप फैसले से सहमत ही हों किंतु आप अपनी असहमति संसद के अंदर उसके नियमों के तहत प्रकट कर सकते हैं। 

आप सरकार को घेर सकते हैं। उस पर दबाव बना सकते हैं,संसद में इसकी पूरी गुंजाइश है। इसके बजाय किसी प्रकार की जिद पकड़कर संसद न चलने देना संसदीय लोकतंत्र के तहत दलों की निर्धारित भूमिका से परे है। दोनों सदनों में विपक्ष की एक मांग यह है कि बहस के दौरान प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित रहें। प्रधानमंत्री बहस का जवाब दे, यह मांग तो समझ में आती है, पर वे पूरी बहस के दौरान उपस्थित रहें, यह समझ से परे और अव्यावहारिक भी है। प्रधानमंत्री के अनेक कार्यक्रम निर्धारित होते हैं। पूरी बहस के दौरान उनका उपस्थित रहना संभव नहीं हो सकता। यह बात विपक्ष को भी पता है। तो क्या ये जानबूझकर ऐसी मांग रख रहे हैं ताकि संसद इसी तरह बाधित रहे? लोक सभा में अलग से विपक्ष ने मांग की है कि कार्यस्थगन प्रस्ताव के तहत बहस हो। इस प्रस्ताव के तहत बहस के बाद मतदान का प्रावधान है। 

लोक सभा में सरकार बहुमत में है, इसलिए मतदान से सरकार की आयु पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। प्रश्न है कि जब राज्य सभा में सामान्य नियम के तहत मतदान आरंभ हो गया तो लोक सभा में क्यों नहीं हो सकता? विपक्ष को समझना चाहिए कि संसद चलाने की प्राथमिक जिम्मेवारी सरकार की अवश्य है पर वह संसद का भाग है और इस नाते उसके ऊपर भी कुछ दायित्व है। दोनों के सहयोग से ही संसद की कार्यवाही सुचारु चल सकती है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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