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डुबकी लगाता रुपया और भारतीय परेशानिया

Sunday, November 27, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। यह तो होना ही था। रुपया ने जो डुबकी मारी है। नोटबंदी की घोषणा न होती, तब भी ऐसा ही होता। अमेरिका के फेडरल रिजर्व की दरों की जब भी समीक्षा होने का समय आता है, तो दुनिया का मौद्रिक संतुलन बदलता ही है। उम्मीद की जा रही है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इस बार अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी ब्याज दर बढ़ा सकता है। यही वजह है कि संस्थागत निवेशक दुनिया भर में लगा अपना धन निकालकर अमेरिकी बाजार में लगा रहे हैं। 

वहां उन्हें कम जोखिम पर ज्यादा कमाई की उम्मीद दिख रही है। इसका असर भारत जैसे बाजारों पर दो तरह से हो रहा है। एक तो शेयर बाजार गोता लगा रहे हैं और दूसरा, बाजार में विदेशी मुद्रा की अचानक कमी पड़ने लगी है। इस बीच इस उलझन में नोटबंदी का एक कारक भी शामिल हो गया है। भारत में जिस तरह से यह नोटबंदी हुई है, उसका अर्थ है, बाजार से अचानक ही नगद भारतीय मुद्रा में 86 प्रतिशत की कमी आ जाना। इससे मांग और आपूर्ति के नियम का जोड़-घटाव करके कोई भी यह सोच सकता है कि बाजार में जब रुपया कम हो गया है, तो उसकी कीमत बढ़नी चाहिए, जबकि उसके मुकाबले डॉलर को कमजोर होना चाहिए, लेकिन हो इसका उल्टा रहा है। 

सच यह है कि रुपये की उपलब्धता भले ही काफी कम हुई हो, लेकिन मुद्रा बाजार में मांग डॉलर की ही ज्यादा बढ़ी है। एक तो जिनके पास बड़ी मात्रा में संपत्ति है, उन्हें रुपये के मुकाबले डॉलर में निवेश ही सबसे सुरक्षित दिखाई दे रहा है। जिनके पास पहले से डॉलर मौजूद हैं, वे उन्हें फिलहाल बाजार में नहीं लाना चाहते। निर्यात पर मंडराते खतरे को देखते हुए निर्यातक भी मौन हैं। नगदी रुपये की तंगी से जूझ रहा रिजर्व बैंक भी फिलहाल इस बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता, इसलिए रुपया लगातार गोता लगा रहा है।

समस्या सिर्फ इतनी नहीं है। आमतौर पर जब रुपया गिरता है, तो यह मान लिया जाता है कि इससे देश का निर्यात बढ़ेगा, क्योंकि डॉलर के हिसाब से उनके सामान की उत्पादन-लागत कम हो जाएगी और निर्यातक स्पद्र्धा में आगे हो जाएंगे। लेकिन नोटबंदी ने इस समीकरण को गड़बड़ा सा दिया है। देश भर से आ रही खबरें बताती हैं कि निर्यात वाले बहुत से कारोबार ठंडे पड़ने लगे हैं। खासकर वे कारोबार, जो अपने माल के लिए स्थानीय दस्तकारों आदि पर निर्भर करते थे। इन्हें दैनिक और कहीं-कहीं पर साप्ताहिक आधार पर नगद मेहनताना दिया जाता है, और नगदी फिलहाल बहुत कम उपलब्ध है। जब उत्पादन ही रुक गया, तो निर्यात क्या होगा?

बाजार के समीकरण हमेशा जटिल होते हैं, जहां एक साथ कई कारक तरह-तरह से अपना दबाव बनाते हैं। काले धन को काबू में लाने के लिए सरकार ने नोटबंदी का जो कदम उठाया है, उससे हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को ही कई स्तरों पर इस जटिलता से जूझना पड़ रहा है। वैसे, यह एक वर्ग यह कह रहा है कि फिलहाल जो परेशानियां हो रही हैं, वे अल्पकालिक हैं और इस कदम का दीर्घकालिक फायदा होना लगभग तय है। नोटबंदी अगर आगे चलकर पूरी अर्थव्यवस्था को मजबूत, ज्यादा भरोसेमंद व पारदर्शी बनाती है, तो फिलहाल की परेशानियों को नजरअंदाज कर देना चाहिए।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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