शिवराज सिंह की ईमानदारी पर सवाल, 12 साल में 11 आयोग, कार्रवाई एक भी नहीं

Sunday, November 6, 2016

भोपाल। सीएम शिवराज सिंह चौहान ईमानदारी का दावा करते है। उनके समर्थक शिवराज सिंह की ईमानदारी की कसमें खाते हैं परंतु रिकॉर्ड बताते हैं कि मुख्यमंत्री, दोषियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। मामला विभिन्न गंभीर मामलों में गठित न्यायिक जांच आयोगों का है, जिसमें जनता से टैक्स के रूप में वसूला गया करोड़ों रुपए खर्चा किया गया लेकिन कार्रवाई किसी पर नहीं की। 12 साल में कुल 11 आयोग बने, रिपोर्ट भी आई, फिर कुछ नहीं हुआ। ये हैं प्रमुख मामले: 

रतनगढ़ हादसा
1 जनवरी 2006 दुर्गा नवमी पर्व के दौरान रतनगढ़ के पास सिंध नदी में अचानक पानी छोड़ने से कई तीर्थ यात्री के डूब गए तथा लापता हो गए। बवाल मचा, सवाल हुए तो न्यायिक जांच आयोग गठित हो गया। 
जांच आयोग: 13 अक्टूबर 2006 में जांच आयोग का गठन हुआ। न्यायमूर्ति सुशील कुमार पांडेय जांच आयोग के अध्यक्ष बने।
क्या हुआ: 21 मार्च 2007 को जांच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ। 22 जुलाई 2014 को विधानसभा के पटल पर रखा गया। लेकिन दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई।

पेंशन घोटाला मामला
सामाजिक सुरक्षा पेंशन और राष्ट्रीय वृद्धापेंशन योजना में अनियमितता हुई थी। इस मामले में भाजपा के एक दिग्गज नेता आरोपी हैं। 
जांच आयोग: 8 फरवरी 2008 में जांच आयोग का गठन हुआ था, न्यायमूर्ति एनके जैन अध्यक्ष थे।
क्या हुआ: 15 सितंबर 2012 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत हुआ। विधानसभा के पटल में जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया। न ही कोई कार्रवाई हुई।

सरदार सरोवर बांध पुनर्वास घोटाला
पुर्नवास में फर्जी रजिस्ट्री, भूमिहीनों के अनुदान में भ्रष्टाचार, मकान, प्लाट आवंटन में धांधली, पुर्नवास निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगी थी।
जांच आयोग: 8 अक्टूबर 2008 को जस्टिस एसएस झा का गठन किया गया।
क्या हुआ: 7 साल बाद 4 जनवरी 2016 को हाईकोर्ट जबलपुर में रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। सरकार का कहना था रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी जाए और सुप्रीमकोर्ट चली गई। सुप्रीमकोर्ट ने कहा 10 दिन में रिपोर्ट लेकर छह महीने में पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करे।

भोपाल गैस कांड
भोपाल में 2-3 दिसंबर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड में गैस का रिसाव हुआ था, उस दिन 2995 लोगों के मरने की पुष्टि हुई। बाद में गैस से मरने प्रभाव के कारण 1998 तक हुए रजिस्ट्रेशन में यह आंकड़ा 15 हजार तक पहुंच गया।
जांच आयोग: 25 अगस्त 2010 को जस्टिस न्यायमूर्ति एसएल कोचर की अध्यक्षता में जहरीली गैस रिसाव के लिए जांच आयोग का गठन किया गया।
क्या हुआ: 24 फरवरी 2015 को सरकार को रिपोर्ट सौंपी गई। लेकिन अब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई।

पेटलावद विस्फोट
12 सितंबर 2015 को झाबुआ जिले के पेटलावद कस्बे में विष्फोट हुआ, जिससे 79 से लोग मारे गए। मामले में आरएसएस कार्यकर्ता पर आरोप लगे। 
जांच आयोग: 15 सितंबर 2015 को ही जांच आयोग गठित हुआ। इसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर्येन्द्र कुमार सक्सेना को अध्यक्ष बनाया गया।
क्या हुआ: दिसंबर 2015 को सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत हुई। दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई। 12 दिसंबर 2014 को विधानसभा में भी प्रस्तुत किया गया।

मंत्री के कारण रतनगढ़ भगदड़ 
13 अक्टूबर 2013 को दतिया जिले की सेवढ़ा तहसील में रतनगढ़ माता मंदिर में दुर्गा नवमीं के अवसर पर श्रद्धालुओं के पुल पार करते समय भगदड़ मची और इसमें 89 लोग मारे गए। आरोप है कि एक मंत्री को रास्ता बनाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया जिससे भगदड़ मची। 
जांच आयोग: 15 अक्टूबर 2013 को राकेश सक्सेना सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित हुई।
क्या हुआ: 22 मार्च 2014 को सरकार को रिपोर्ट सौंपी गई।

ऐसे खर्च होता है जनता का पैसा 
आयोग के अध्यक्ष का प्रतिमाह 80 हजार वेतन, इसके अलावा सचिव, दो क्लर्क, एक स्टेनो, एक कम्प्यूटर ऑपरेटर, ड्राइवर के वेतन। इसके अलावा यात्रा भत्ता, खाने पीने का खर्च, दो कम्प्यूटर, स्टेशनरी, पूरा दफ्तर का सामान, दो गाड़ियां का खर्च। इस तरह एक महीने कम से कम 4 से 5 लाख खर्च आता है। इस तरह एक आयोग पर साल भर में 50 से 60 लाख खर्च होते हैं।
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