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यहां स्थित है माता भद्रकाली का प्राचीन मंदिर, दर्शन मात्र से शत्रुओं का नाश

Saturday, October 22, 2016

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उत्तराखंड की जनपद बागेश्वर की पावन भूमि पर कमस्यार घाटी में स्थित माता भद्रकाली का परम पावन दरबार सदियों से आस्था व भक्ति का अलौकिक संगम है। कहा जाता है, कि माता भद्रकाली के इस दरबार में मांगी गई मनौती कभी भी व्यर्थ नही जाती है। जो भी श्रद्धा व भक्ति के साथ अपनी आराधना के श्रद्धा पुष्प माँ के चरणों में अर्पित करता है, वह परम कल्याण का भागी बनता है। माता श्री महाकाली के अनन्त स्वरुपों के क्रम में माता भद्रकाली का भी बड़ा ही विराट वर्णन मिलता है। 

धौलीनाग के प्रसंग में भी माता भद्रकाली का बड़ा ही निराला वर्णन मिलता है। उल्लेखनीय है,कि धौलीनाग अर्थात् धवल नाग का मंदिर बागेश्वर जनपद अर्न्तगत विजयपुर नामक स्थान से कुछ ही दूरी पर पहाड़ की रमणीक छटाओं के मध्य भद्र काली पर्वत की परिधि का ही एक हिस्सा है। हिमालयी नागों में धवल नाग यानी धौली नाग का पूजन मनुष्य के जीवन को ऐश्वर्यता प्रदान करता है, महर्षि व्यास जी ने स्कंद पुराण के मानस खण्ड के 83 वें अध्याय में भद्रकाली के प्रिय इस नाग देवता नाग की महिमा का सुन्दर वर्णन करते हुए लिखा है।
धवल नाग नागेश नागकन्या निषेवितम्।
प्रसादा तस्य सम्पूज्य विभवं प्राप्नुयात्ररः।।
(18/19 मानस खण्ड 83)

कहा जाता है, इस मंदिर की पूजा खासतौर पर नाग कन्यायें करती है, कुमाऊं के प्रसिद्ध नाग मदिर क्षेत्र सनिउडियार भी नाग कन्याओं के ही तपोबल से प्रकाश में आया शाण्डिल ऋषि के प्रसंग में श्री मूल नारायण की कन्या ने अपनी सखियों के साथ मिलकर इस स्थान की खोज की इस विषय पर पुराणों में विस्तार के साथ कथा आती है, नाग कन्याओं को गोपियों के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है, इन्हीं की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी गोपेश्वर के रुप में यहा स्थित हुए और नागों के आराध्य बने इस भाग को गोपीवन भी कहा जाता है भद्रपुर नामक आदि अनेक स्थान गोपीवन के ही भाग है, भद्रपुर में ही कालिय नाग का पुत्र भद्रनाग का वास है। भद्रकाली इनकी ईष्ट है, भद्रापर्वत के दक्षिण की और से इनके पिता कालीय नाग माता कालिका देवी का पूजन करते है।
ततस्तु पूर्व भागे वै भद्राया दक्षिणे तथा काली सम्पूज्यते विप्राः कालीयने महात्मना।।
(मानखण्ड अ0 81/श्लोक 11)

उल्लेखनीय है ,कि यहां पर माँ भद्रकाली पूर्ण रूप से वैष्णवस्वरूप में पूज्यनीय है, माँ भद्रकाली को ब्रह्मचारिणी के नाम से भी जाना जाता है। वैष्णों देवी मन्दिर के अलावा भारत भूमि में यही एक अद्भुत स्थान है, जहां माता भद्रकाली की महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती तीनो रुपों में पूजा होती है। इन स्वरुपों में पूजन होने के कारण इस स्थान का महत्व सनातन काल से पूज्यनीय रहा है, आदि जगत गुरु शंकरार्चाय ने इस स्थान के दर्शन कर स्वयं को धंन्य माना। माँ भद्रकाली की एतिहासिक गुफा अद्भुत व अलौकिक स्वरुप है, जो मन्दिर के नीचे है, गुफा के नीचे कल कल धुन में नृत्य करते हुए नदी  बहती है, इसी गुफा के ऊपर माँ भद्रकाली विराजमान है। 

माना जाता है यहां पर मन्दिर का निर्माण लगभग संम्वत् ९८६ ई (सन् 930) एक महायोगी  संत ने कराया व मन्दिर में पूजा का विधान नियत किया। देवी के इस दरबार में समय समय पर अनेकों धार्मिक अनुष्ठान सम्पन होते रहते है। मन्दिर में पूजा के लिये चंद राजाओं के  समय से आचार्य एवं पूजारियों की व्यवस्था की गई है। 
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