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यादवी संघर्ष में बदला मुलायम समाजवाद

Sunday, September 18, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। समाजवादी नेतृत्व की तरफ से जनता का दिया यह आश्वासन चिंदी-चिंदी हो गया कि परिवार, पार्टी और सरकार में सब कुछ सामान्य हो गया है। दरअसल, निहित स्वार्थ या खुद के सही होने के आम बात को दरकिनार कर दें तो बाकी जो कुछ है, उसमें एक पाटी न जा सकने वाली दरार दिख रही है। अचरज यह कि दोनों पक्ष यह सारा कुछ नेता जी के नाम-जाप के आधार पर कर रहा है|इसमें संदेह नहीं कि नेताजी मुलायम सिंह यादव की हैसियत निर्विवाद है। सारा कुछ उनका ही तो खड़ा किया हुआ है पर दुखद यह है कि उनकी सुलह की व्यवस्था को भी हरेक कोई आंखें मूंदकर नहीं बल्कि अपने लाभ के हिसाब से मानना चाह रहा है। जहां हित नहीं सध रहा, वहां विरोध, ब्लैकमेलिंग और बगावत तक हो जा रही है।

पर कहा यही जा रहा कि नेताजी जो कहेंगे, मानेंगे आम परिवार में ऐसा संभव हो जाता है पर किसी सत्ताधारी परिवार में एकता हितों के न्यायसंगत विभाजन के बिना संभव नहीं होती। वैसे में तो और भी मुश्किल होती है, जब एक पक्ष को अपनी साबित सांगठनिक क्षमता पर अभिमान हो और दूसरे को अपने नेक काम और साफ छवि की अवधारणा का। पार्टी के संदर्भ में इन दोनों का योगफल सरकार है शिवपाल यादव और अखिलेश यादव इसे समझते नहीं होंगे, मानना कठिन है।

फिर भी अगर अपनी-अपनी हैसियत को लेकर इतने तल्ख हैं कि लचीले होते नहीं दिख रहे तो इसका मतलब यही है कि मध्यस्थकार के बावजूद उन्हें उनके हितों की सुनिश्चितता नहीं दिख रही है। अगर बर्खास्त मंत्री बहाल हो जाएं, शिवपाल के विभाग लौटा दिये जाएं, ‘बाहरी व्यक्ति’ बाहर कर दिया जाए और अखिलेश को फैसले करने के हक दिये जाएं तो भी यह संकट पर स्थायी विराम की गारंटी शायद ही होगी।

इसलिए कि संबंधों में संदेह और अविश्वास के सिर उठाने की आदत पकी हुई मालूम पड़ती है। ऐसे में, आगे किसी व्यवस्था के तहत मेल-मिलाप हो जाए तो भी वह कामचलाऊ होगा। अगर भाई-भाई और चाचा-भतीजे के घने रिश्तों की दुहाई के मूल में वही सहज मिठास-अहसास न रहे। फिर तो यह स्थिति न तो परिवार, पार्टी और न ही सरकार के हक होगी।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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