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लुक्का डाकू: जिन्हे आजादी के बाद भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं माना

Monday, September 26, 2016

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भोपाल। यह चंबल में डाकुओं की पहली पीढ़ी कही जाती है। डाकू मानसिंह ने इस गिरोह की शुरूआत की। यह गिरोह अंग्रेजों और जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ तैयार हुआ। मान सिंह ने हथियार उठाए और फिर कई बागी इसमें शामिल हो गए। डाकू लुक्का के नाम से कुख्यात हुए लोकमन दीक्षित भी इन्हीं में से एक थे। 

1955 ई. में डकैत मान सिंह की मौत के बाद लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का को गैंग का मुखिया बनाया गया। लुक्का ने यह जिम्मेदारी उठाई और आतंक का दूसरा पर्याय बन गया। चंबल के बीहड़ों के आसपास से भी गुजरने वाले जमींदारों और अंग्रेज अफसरों को मान सिंह गिरोह निशाना बनाया करता था। लुक्का डाकू के सरदार बनने के बाद गिरोह की नीतियों में बदलाव किया गया और उनके घरों में घुसकर उन्हें लूटा जाने लगा। हालात यह बने कि आगरा से ग्वालियर की तरफ जाने वाले अंग्रेज अफसर तब तक दहशत में रहते थे जब तक कि वो ग्वालियर नहीं पहुंच जाते थे। 

डाकुओं ने भी मनाया था आजादी का जश्न
1947 में देश आजाद हुआ तो आम जनता के साथ चंबल के डाकुओं ने भी आजादी का जश्न मनाया। डाकू मानसिंह के साथी और उनके मरने के बाद गिरोह के सरदार रहे लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का ने बताया कि देश आजाद हुआ तो हम भी खुश हुए। क्विटलों लड्डू बांटे गए। जश्न मनाया गया कि अब शोषण और अन्याय बंद होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आजादी के बाद भी सरकार ने इन्हे डाकू ही माना और पुलिस कार्रवाई जारी रही। जबकि जो अपराधी अंग्रेजों को नुक्सान पहुंचाते हुए गिरफ्तार हो गए थे, उन्हे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मान लिया गया। 

कैसे हुआ हृदय परिवर्तन
गिरोह चलाने के लिए बहुत से धन की जरूरत होती थी। अत: लूटपाट करना मजबूरी बन गया। जब लुक्का डाकू का आतंक चारों और फैला था और वो भेष बदलकर एक बस्ती में था तभी तभी एक दिन उसकी भिड़ंत एक रिक्शे वाले से हो गई। रिक्शे वाले ने उसे टक्कर मार दी। इसके बाद वह उतरकर लुक्का को एक लात मारता हुआ आगे बढ़ गया। बस, इस घटना ने लुक्का को पूरी तरह से बदल दिया। लुक्का को यह अहसास हुआ कि यह उसके बुरे कर्मो का ही फल है, जो एक रिक्शा वाला उसे लात मारकर चला गया और वह देखता रह गया। इस घटना ने उसे परिवर्तित कर दिया। 1960 में जब आचार्य विनोबा भावे ने अपील की तो डाकू लोकमन दीक्षित ने अपने गिरोह के साथ समर्पण कर दिया। 95 साल की उम्र में 25 सितम्बर 2016 को उनकी मौत हो गई। मृत्यु से पहले लोकमन दीक्षित को मलाल था कि नाइंसाफी तो अब पहले, भी ज्यादा बढ़ गई है। उनके मुताबिक उस वक्त देखे गए सारे सपने चूर हो गए।

डाकुओं के अपने सिद्धांत हुआ करते थे 
मानसिंह गिरोह के सरदार रह चुके लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का डाकू की इस बात पर शायद तथाकथित पढ़े लिखे लोग यकीन नहीं करेंगे कि डकैतों के भी अपने आदर्श और सिद्धांत हुआ करते थे। डकैती के वक्त डाकू घर की किसी महिला को स्पर्श नहीं करते थे। लुक्का ने एक मीडिया हाउस को बताया था कि, "हम लोग डकैती के दौरान किसी बहन व बेटी के गहने नहीं लूटते थे और न ही विवाहित महिला के मंगलसूत्र को हाथ लगाते थे।
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