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एसोचैम ने खोली शिवराज के दावों की पोल, उल्टा घट गया निवेश

Monday, August 1, 2016

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भोपाल। एसोसिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्टीज ऑफ इंडिया की अध्ययन रिपोर्ट ने शिवराज सिंह चौहान के मप्र में भारी निवेश के तमाम दावों की पोल खोल दी। एसोचैम ने खुलासा किया है कि शिवराज सिंह की तमाम विदेश यात्राओं के बावजूद मप्र में निवेश बढ़ा नहीं बल्कि 14 प्रतिशत घट गया है। इतना ही नहीं देश में मप्र का औद्योगिक योगदान भी घट गया, मतलब जो उद्योग चल रहे थे वो भी बंद हो रहे हैं। कृषि क्षेत्र में सरकार को 'कृषि कर्मण अवार्ड' मिला है लेकिन धरातल पर कोई तरक्की नहीं हो पाई है। 87 प्रतिशत निवेश पिछले 57 महीनों से अफसरशाही के जाल में फंसा हुआ है जबकि 44 हजार करोड़ रुपए की निवेश घोषणाएं ऐसी हैं जो केवल घोषणाएं ही थीं। 

एसोचैम ने वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 'एनालिसिस ऑफ मध्य प्रदेश' इकॉनोमी, इंफ्रास्ट्रक्च एण्ड इंवेस्टमेंट' (मध्य प्रदेश का विश्लेषण : अर्थव्यवस्था, मूलभूत ढांचा एवं निवेश) विषय पर अध्ययन किया। अध्ययन की रिपोर्ट सोमवार को जारी की गई।

44 हजार करोड़ का निवेश केवल घोषणाओं में 
रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरे वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान राज्य में आकर्षित 53 हजार करोड़ रुपये नए निवेश का करीब 86.5 प्रतिशत (लगभग 44 हजार करोड़) हिस्सा अब भी केवल घोषणा तक ही सीमित है। निवेश से शुरू हुईं शेष परियोजनाएं अपनी स्वीकृतियों के विभिन्न स्तरों या चरणों में हैं।

अध्ययन में कहा गया है, "वर्ष 2013-14 में करीब 60 प्रतिशत गिरावट के बाद वैश्विक निवेशक शिखर सम्मेलन के आयोजन के फलस्वरूप राज्य में नए निवेश में साल दर साल 700 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई, लेकिन गिरावट का दौर फिर शुरू हुआ और वर्ष 2015-16 में इसमें 14 प्रतिशत की कमी आई।"

3 लाख करोड़ की परियोजनाएं अटकी हुईं हैं
पिछले वित्त वर्ष के दौरान राज्य में निर्माण क्षेत्र में सर्वाधिक लगभग 68 प्रतिशत नया निवेश आया। इसके अलावा बिजली (19 प्रतिशत), सेवा (11.5 प्रतिशत) और निर्माण (01 प्रतिशत) क्षेत्र में नया निवेश आया। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2015-16 तक कुल 5.75 लाख करोड़ रुपये का लाइव (सक्रिय) निवेश हासिल हुआ था। इस तरह एक साल में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि दर प्राप्त हुई, जबकि एक साल (2014-15) पहले तक राज्य में 5.50 लाख करोड़ रुपये का लाइव निवेश आया था। इस निवेश के प्रस्तावों में से लगभग तीन लाख करोड़ की परियोजनाएं विभिन्न कारणों से अटकी पड़ी हैं।

राज्य में कुल सक्रिय निवेश का सर्वाधिक करीब 55 प्रतिशत हिस्सा बिजली क्षेत्र में है। वहीं विनिर्माण क्षेत्र में 20 प्रतिशत, गैर-वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में 12 प्रतिशत, सिंचाई क्षेत्र में छह प्रतिशत, खनन में चार प्रतिशत, निर्माण एवं रियल एस्टेट में तीन प्रतिशत ऐसा निवेश आकर्षित हुआ है।

87 प्रतिशत निवेश 57 महीने से अटका हुआ है 
अध्ययन के अनुसार, राज्य में करीब 87 प्रतिशत निवेश परियोजनाएं ऐसी हैं, जो औसतन 57 महीने विलम्ब से चल रही हैं। देरी के कारण 57 निवेश परियोजनाओं की लागत 35 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई, जिससे करीब 67 हजार करोड़ रुपये तक की लागत बढ़ चुकी है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन परियोजनाओं की वास्तविक लागत लगभग दो लाख करोड़ रुपये ही थी। जो बढ़कर दो लाख 67 हजार करोड़ रुपये हो गई है। पूर्ण होने में विलम्ब के कारण परियोजनाओं की बढ़ी कुल लागत में बिजली क्षेत्र की सर्वाधिक 60.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वहीं सिंचाई (27 प्रतिशत), गैर-वित्तीय सेवाओं (सात प्रतिशत) और विनिर्माण (06 प्रतिशत) की हिस्सेदारी है।

मप्र में निवेशकों की रुचि घट गई
एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, भौतिक तथा सामाजिक ढांचे के अव्यवस्थित विकास की वजह से भागीदारी के मामले में निजी क्षेत्र की दिलचस्पी घटी है। इसकी वजह से मध्य प्रदेश में निवेश परिदृष्य की चमक फीकी हुई है।

देश में मप्र का योगदान घट गया
रिपोर्ट के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में मध्य प्रदेश का योगदान वर्ष 2005-06 के 4 प्रतिशत के स्तर के मुकाबले 2013-14 में 3.9 प्रतिशत रहा। यानी इसमें भी 0.1 प्रतिशत की गिरावट आई है।

कृषि क्षेत्र में अवार्ड मिला लेकिन तरक्की नहीं हुई 
अध्ययन के अनुसार, राज्य के करीब 70 प्रतिशत कामगार अपनी रोजी-रोटी के लिए कृषि पर निर्भर हैं, फिर भी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में इस क्षेत्र का योगदान आशा के अनुरूप नहीं है। वर्ष 2004-05 में जहां मध्य प्रदेश के जीएसडीपी में कृर्षि क्षेत्र का योगदान 27.7 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2014-15 में यह 28.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सका।

औद्योगिक योगदान 4 प्रतिशत गिर गया
चिंताजनक पहलू यह भी है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक 26 प्रतिशत के मुकाबले 2014-15 में 22 प्रतिशत के स्तर तक जा गिरा। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में कामगारों की निर्भरता भी वर्ष 2001 में चार प्रतिशत के मुकाबले 2011 में घटकर तीन प्रतिशत हो गर्ई।
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