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दलित छात्र को स्मृति ईरानी की सिफारिश भी नहीं दिला पाई स्कूल में एडमिशन

Wednesday, August 24, 2016

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भोपाल। राहुल गांधी के पीछे 1 रुपए का अखबार लेकर दौड़े 14 वर्षीय दलित बालक की जिंदगी ड्रामा बनकर रह गई। पहले राहुल गांधी और उसके बाद स्मृति ईरानी ने संवेदनशीलता का ढोंग तो बहुत किया परंतु कौशल शाक्य की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। वो आज भी 150 रुपए की दिहाड़ी मजदूरी पर काम कर रहा है और स्कूल नहीं जाता। 3 साल से उसके नाम पर बस राजनीति ही चल रही है। 

कहानी अप्रैल 2013 से शुरू हुई जब राहुल गांधी भोपाल आए थे। प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर एक बच्चा (कौशल शाक्य) अखबार बेच रहा था। 1 रुपए का अखबार बेचने के लिए उसने राहुल गांधी की कार के पीछे दौड़ लगा दी। राहुल ने अपनी गाड़ी रुकवाई और बच्चे से एक अखबार खरीदा। अखबार के बदले में राहुल ने बच्चे को एक हजार का नोट दिया, लेकिन बच्चे ने नोट लौटाते हुए कहा कि सिर्फ एक रुपए चाहिए, राहुल ने कहा कि पूरे रख लो। बच्चे ने जवाब दिया कि मैं हराम का नहीं खाता।

इसके बाद राहुल गांधी ने बच्चे से पूछा स्कूल जाते हो, बच्चे ने जवाब दिया, इस साल उसने स्कूल छोड़ दिया है, जाना तो चाहता है लेकिन घर की आर्थिक हालत खराब है पिता को कोई काम नहीं मिल रहा, इसलिए अखबार बेचकर घर चलाने के लिए कुछ पैसे कमा लेता हूं। राहुल गांधी ने स्थानीय कांग्रेस नेताओं को बुलाकर बच्चे की आगे की पढ़ाई के लिए मदद करने को कहा।

फिर भूरिया बने हीरो
राहुल गांधी के निर्देश पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से कौशल शाक्य को हर माह पढ़ाई के लिए 1 हजार रुपए स्टायपेंड दिलाने की घोषणा की थी जो दो महीने तो मिला फिर बंद हो गया। 

स्मृति ईरानी ने मौका भुनाया
जब मामला दोबारा मीडिया में उठा तो कांग्रेस को नीचा दिखाने के लिए भाजपा मैदान में आ गई। मामला राहुल गांधी का था इसलिए तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी 6 अप्रैल 2016 को केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-1 को पत्र भेजकर विशेष कोटे से कौशल का दाखिला कक्षा-6 में किए जाने के निर्देश दिए थे। तत्कालीन प्राचार्य मधु पांडेय ने 2 मई को कौशल के पिता दुलीचंद शाक्य बुलवाया। फिर मामले को नियमों में उलझा दिया गया और एडमिशन नहीं दिया गया। 

वो आज भी दर दर भटक रहा है
कुल मिलाकर एक दलित बालक की जिंदगी को राजनीति के दिग्गजों ने ड्रामा बनाकर रख दिया। राहुल गांधी की संवेदनशीलता मीडिया में आईं पहली खबरों तक ही रह गईं। इसके बाद कोई फालोअप नहीं हुआ। स्मृति ईरानी की संवेदनशीलता भी राहुल गांधी को नीचा दिखाने तक ही सीमित रहीं। दलित बालक का जीवन संवर जाए यह चिंता किसी ने नहीं की। वो आज भी दर दर भटक रहा है। 
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