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दलितों के भीतर एक नया आंदोलन पनप रहा है: भारती

Tuesday, August 30, 2016

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श्रिया मोहन। 29 अगस्त को भारत के 25 राज्यों से दलित, मुस्लिम और आदिवासी गुजरात के जूनागढ़ में अशोक के शिलालेख के पास इकट्ठा होंगे और देशभर में अपने सम्मान और समानता के लिए रैली निकालेंगे। 'दलित चले संघर्ष की ओर' शीर्षक से यह रैली दलित संघर्ष मंच द्वारा आयोजित की गई है। दलित संघर्ष मंच 1000 दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों का एक असंगठित समूह है, जो ऊना के दलितों के असाधारण विद्रोह के बाद भारत के अल्पसंख्यकों के मुद्दों को आवाज देने के लिए एक हुआ है। 25 राज्यों का दौरा करने के बाद यह रैली 20 नवंबर को नई दिल्ली में समाप्त होगी, जहां रैली में शामिल लोग प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी बात पहुंचाने की उम्मीद कर रहे हैं।

दलित और आदिवासी संगठनों का राष्ट्रीय संघ (एनएसीडीओआर) के अध्यक्ष अशोक भारती इस रैली के राष्ट्रीय आयोजक हैं। हालिया बातचीत में भारती ने बताया कि 50,000 दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक राजधानी में क्रांति के लिए क्यों आमादा हैं और क्यों वे एक नई सामाजिक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा लंबे समय से दलित नाराज हैं। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब एक दलित मां और बच्चे को फरीदाबाद में जातिगत लड़ाई के चलते जिंदा जला दिया गया था. एक मंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक दलित को कुत्ता कहा. मंत्री को फिर भी हटाया नहीं गया. फिर रोहित वेमुला की आत्महत्या की घटना सामने आई और अंत में गुजरात का वाकया. बर्दाश्त की एक हद होती है.

भारत में दलितों के साथ प्रतिवर्ष 50,000 से ज्यादा अत्याचार और प्रताड़ना के मामले दर्ज होते हैं. सरकार के खुद के आंकड़ों के मुताबिक 6 दलितों का प्रतिदिन बलात्कार होता है और 25 घटनाएं यातना की होती हैं. उनमें से केवल एक दर्ज होती है. इसी तरह दलितों का बड़ी संख्या में अनादर और अपमान होता है जो कभी पुलिस में दर्ज ही नहीं होता.

इसलिए हमने सोचा कि चुप रहना विकल्प नहीं है. हम उम्मीद करते हैं कि यह विरोध की एक बड़ी लहर बनेगी. हम सरकार से कहना चाहते हैं कि बहुत हो गया. इसलिए हमने देशभर से जनसमूह को संगठित करना शुरू किया है- महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर पूर्व और गुजरात तक.

भारत बताते हैं कि हमारी मांगों का स्वरूप केवल राजनीतिक नहीं बल्कि बुनियादी है. सरकार से हमारी पहली मांग है कि सरकार के सभी अंगों, संविधान और न्यायपालिका द्वारा सबको बराबर सम्मान मिले.

दूसरी है, दलितों के विकास के लिए जरूरी उपाय किए जाये. आदिवासी-दलित गरीब और वंचित हैं क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों का वितरण एक समान नहीं है. हमारी मांग है कि संसाधनों का बराबर वितरण किया जाए, चाहे वह जमीन, खनन कुछ भी हो. इससे दलित और आदिवासियों के विकास की जरूरतों का ध्यान रखा जा सकेगा.

हमारी मांग दलित भूमिहीनों के लिए 5 एकड़ जमीन की है. इसमें केवल दलित नहीं हैं, सभी शामिल हैं. जमीन के लिए काफी बड़ा आंदोलन है. और इसका नारा है 'जय भीम! 5 एकड़'. केआर नारायणन द्वारा स्थापित गवर्नरों की समिति को नजर में रखा जाए, तो इस मांग का औचित्य है, जिसने कहा था कि भारत के पास सभी भूमिहीनों को देने के लिए जमीन है.

हमारी शिक्षा व्यवस्था का काफी निजीकरण हो रहा है. हम चाहते हैं कि सरकार शिक्षा में अपने संसाधनों का कम से कम छह फीसदी व्यय करे. भारत की शिक्षा व्यवस्था में दखल देकर निजी खिलाड़ी उसे आमजन के लिए वहन करने में असमर्थ और पहुंच से बाहर क्यों कर रहे हैं?

अंत में हम महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की आबादी में हिस्सेदारी के हिसाब से न्यायपालिका और नौकरशाही में सुधार की मांग कर रहे हैं. हमें दलितों और आदिवासियों के पक्ष में सही फैसले का अब भी इंतजार है. एक निष्पक्ष न्यायपालिका को समाज के सभी सदस्यों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए.

1932 के पूना समझौते के तहत अंबेडकर को समझौता करना पड़ा था, जो दलितों के लिए एक पृथक निर्वाचन-क्षेत्र चाहते थे. गांधीजी को डर था कि कहीं 'दोहरा मत' हिंदुओं का विभाजन न कर दे. उनकी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए अंबेडकर आरक्षित कोटे की व्यवस्था से सहमत हो गए थे.

पूना समझौता एक प्रगतिशील सामाजिक अनुबंध था, जो एक ओर हिंदुओं और महात्मा गांधी और बजाज के बीच था. दूसरी ओर डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों के साथ था. इसका मकसद सालों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव में सुधार लाना था.

यह प्रभावहीन रहा क्योंकि इसने उसको संसद और विधान सभा में आरक्षण में बदल दिया. सात दशकों का संसदीय लोकतंत्र होने के बाद भी हम देख रहे हैं कि आरक्षित सीट से संसद में चुना गया कोई भी दलित हमारे हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा. क्योंकि वे पार्टी के आदेशों और नीतियों को मानने के लिए बाध्य हैं.

बदकिस्मती से पिछले कुछ दशकों से हमने देखा है कि दलितों को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया है. हालांकि वे राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रहे हैं, पर दूसरे दल समुदाय के मुद्दों को पर्याप्त रूप से नहीं उठाते. यदि दलितों को अपना दलित नेता सीधा चुनने का मौका दिया जाए, तो ही सही मायने में दलित नेतृत्व उभरेगा. अधिकांश दलितों को दलितों का नेता बनाया गया था. राम विलास पासवान को दलित नेता बनाया गया था. सरकार का हिस्सा होना इसकी गारंटी नहीं है कि आप दलितों के नेता हैं. यह संसदीय लोतकतंत्र की कमी है. जिन नेताओं की पृष्ठभूमि दलित समुदाय की नहीं होती है, वे उनके नेता बन जातेे हैं.

लेकिन हम संसद में महज बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं चाहते. हम देश की संपदा, अर्थ, व्यवसाय और शिक्षा में ठोस अनुपातिक हिस्सा चाहते हैं. लोकतंत्र तब तक फल-फूल नहीं सकता जब तक कि देश में हाशिए पर पड़े अधिकांश लोग अपनी योग्यता के साथ सब जगह नजर नहीं आएं.

हम चाहते हैं कि देश के प्राकृतिक संसाधन शेयर किए जाएं. जब सरकार खनन का लाइसेंस देती है, उन्हें दलितों और आदिवासियों के लिए विक्रेता के तौर पर आवेदन करने के लिए माहौल बनाना चाहिए. करोड़ो रुपये के अनुबंध के लिए क्या एक दीन-हीन व्यक्ति नीलामी लगा सकता है? दलितों और आदिवासियों के इसमें हिस्सा लेने के लिए सरकार को एक व्यवस्था बनानी होगी.

उना में क्या हुआ. वे हमें गाय के शव नहीं ले जाने देते. हम फिर चमड़े का व्यवसाय कैसे करेंगे? गंदगी साफ करने और हाउसकीपिंग का काम दलित करते हैं, जबकि हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में पैसा बनाने का काम उच्च जाति के लोग करते हैं.

मेरा यही मतलब है जब मैं कहता हूं कि हमें एक नए सामाजिक समीकरण की आवश्यकता है, जहां सबको समान आदर मिलता हो, समानता हो और जहां सरकार हमें सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए समान अवसर देती हो.

हम आरक्षण की ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां जनसंख्या का सभी अवसरों के लिए सौ फीसदी आनुपातिक आरक्षण हो. वह मेरिट क्या हुआ, जो सबके लिए मेरिट नहीं हो. आप चाहें तो मेरिट के लिए कोई भी योग्यता तय कर दें, पर हर समुदाय को बराबर का मौका दें.

प्रो. कांचा इलैया ने मुझे एक बार कहा था कि जब कोई दलित सरकार की सेवा करता है, तो जाति व्यवस्था अपने आप बनी रहती है. वह सवर्णों का सेवक बनता है, अपने वृहद समुदाय के लिए कुछ भी करने में असमर्थ. क्या इस वजह से दलित अपनी सत्ता का इस्तेमाल समुदाय के हित में नहीं कर पाते हैं?

मैं 17 साल सरकारी अफसर रहा और बिना वीआरएस के त्याग-पत्र दिया. जब आप ऑफिस जाते हैं, आपके पहुंचने से पहले आपकी जाति पहुंच जाती है. जब आपके आसपास के लोग मुख्य रूप से उच्च जाति के हैं, तो इससे दलित असुरक्षित महसूस करता है. कलंक और जाति पर आधारित संबंध बदल नहीं सकते और उस पर चलना आसान नहीं है. राजनीतिक बदलाव ही पर्याप्त नहीं है. इसके लिए सामाजिक बदलाव की जरूरत है.

दलित की दो परिभाषाएं हैं. पहली जो दलितों की खुद की है और दूसरी ब्राह्मणवादी विद्वानों की. यदि आप 1972 का घोषणा-पत्र देखें, दलितों की परिभाषा में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, सामाजिक रूप से पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिलाएं और दमित समुदाय शामिल हैं लेकिन विद्वान लोग परिभाषा को नहीं समझ सके. उसकी आत्मा को समझे बिना, उन्होंने उसे समष्टि रूप में लिया और दलितों को अनुसूचित जाति के रूप में परिभाषित किया. जब मायावती सत्ता में आईं, हमने देखा कि वर्ग और जाति एक हो गए. अब उना ने और भी बड़ा वर्ग बना दिया. ग्रामीण इलाकों में गरीब ब्राह्मण भी कहेगा, 'मैं भी दलित हूं.' तो एक गरीब दलित की परिभाषा को औरों से बेहतर समझता है.
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