जीएसटी: देर आयद दुरुस्त आयद

Tuesday, August 9, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। जीएसटी बिल संविधान सशोधन के साथ संसद ने पारित कर दिया। सवाल यह है की जीएसटी के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने की जरूरत क्यों पड़ी ? ऐसा इसलिए, क्योंकि संविधान के अनुसार कराधान की शक्ति को केंद्र व राज्य, दोनों में बांटा गया है। अनुच्छेद 265 इस शक्ति पर एक महत्वपूर्ण अंकुश लगाता है कि ‘वैधानिक निकायों के अलावा कोई और संस्था टैक्स लगा या वसूल नहीं सकती।’ इसका अर्थ है कि जीएसटी जैसे कर की वसूली के लिए संसद या राज्य विधानमंडल की मंजूरी अनिवार्य है। इस प्रावधान को बदलने की जरूरत थी, क्योंकि जीएसटी में तीन ही कर वसूले जाएंगे- पहला सेंट्रल जीएसटी (सीजीएसटी), जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा स्टेट जीएसटी (एसजीएसटी), जो राज्य सरकार अपने यहां के कारोबार पर वसूलेगी, और तीसरा, दो राज्यों के बीच वस्तुओं व सेवाओं के कारोबार पर वसूली जाने वाली इंटीग्रेटेड जीएसटी (आईजीएसटी), जो सिर्फ केंद्र सरकार वसूलेगी। ये काम तभी संभव हो पाते, जब कराधान व्यवस्था में संशोधन हो पाता। लिहाजा 122वां संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया।

जीएसटी को समझने के लिए इस बिल की कुछ विशेषताओं को भी हमें समझना चाहिए। इसकी पहली विशेषता यह है कि यह संसद और राज्य विधानमंडल को जीएसटी पर कानून बनाने के लिए समान अधिकार देती है। आईजीएसटी की ही बात करें, तो एक केंद्रीय कानून के तहत केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व-बंटवारे की व्यवस्था की जाएगी। दूसरी विशेषता, जीएसटी विधेयक में जीएसटी कौंसिल के गठन संबंधी प्रस्ताव हैं। यही कौंसिल जीएसटी के क्रियान्वयन से जुड़ी सिफारिशें करेगी। इसमें केंद्र व राज्य, दोनों के प्रतिनिधि होंगे, और वोटिंग के लिए केंद्र के पास एक-तिहाई व राज्य के पास दो-तिहाई शक्ति होगी। तीसरी विशेषता यह है कि जीएसटी तमाम तरह की वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगेगी, पर मानव उपभोग के लिए शराब  इसमें शामिल नहीं है।इसके अलावा, शुरू में यह कर कच्चे पेट्रोलियम पदार्थों, हाई-स्पीड डीजल, मोटर स्प्रिट, प्राकृतिक गैस व विमानन टरबाइन ईंधन पर भी नहीं लगेगा। यह छूट कब खत्म करनी है, इसका फैसला जीएसटी कौंसिल ही करेगी।

जीएसटी विधेयक मई, 2015 में ही लोकसभा से पारित हो गया था, मगर राज्यसभा से पारित होने में इसे वक्त इसलिए लगा, क्योंकि इसे लेकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की कुछ आपत्तियां थीं। उसकी पहली आपत्ति यही थी कि सांविधानिक प्रावधान करके कर की ऊपरी सीमा तय की जाए, ताकि वे अनुचित तरीके से न बढ़ाए जा सकें और उपभोक्ताओं के हितों को चोट न पहुंचे। कांग्रेस ने ऊपरी सीमा 18 फीसदी करने का प्रस्ताव दिया था। उसकी दूसरी आपत्ति एक फीसदी अतिरिक्त टैक्स-वसूली को लेकर थी। पार्टी का मानना था कि यह बाजार के हित में नहीं है और इसका बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कांग्रेस का तीसरा विरोध विधेयक में लिखित ‘सप्लाई/ सप्लाइज’ शब्द से जुड़ा था। उसका कहना था कि बिना परिभाषित किए उपबंध नौ और 18 में इसका इस्तेमाल किया गया है।

कांग्रेस की मांग थी कि एक ही मालिक की वस्तुओं की दो राज्यों के बीच आवाजाही को इस ‘सप्लाई/ सप्लाइज’ से बाहर रखा जाना चाहिए। कांग्रेस की चौथी आपत्ति जीएसटी कौंसिल को लेकर थी। विवादों के निपटारे के लिए वह ‘जीएसटी डिस्प्यूट सेट्लमेंट अथॉरिटी’ के पक्ष में थी। उसका कहना था कि विवाद जीएसटी कौंसिल को नहीं भेजा जाना चाहिए। खैर, इनमें से ज्यादातर मुद्दों को अब सुलझा लिया गया है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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